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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 444, कुल 760 में से

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पृष्ठ 444

४१६ बृहत्संहिता
ऐशान्यां दिशि देवलकेन भोजकेनोपसङ्गमः संयोगो भवति। धान्यरत्नपशूनां च लब्धिः।
प्राक् प्रथमे पूर्वस्यां दिशि प्रथमे भागे वस्त्राप्तिरम्बरलाभो बन्धक्या वेश्यया सह समागमो
भवति।।१६।।
अन्यदप्याह—
रजकेन समायोगो जलजद्रव्यागमश्च परतोऽतः।
हस्त्युपजीविसमाजश्चास्माद् धनहस्तिलब्धिश्च ॥१७॥
ईशान कोण से तृतीय भाग में स्थित शकुन कोलाहल करे तो धोबी के साथ
समागम और जल से उत्पन्न द्रव्य का लाभ होता है। ईशान कोण से चतुर्थ भाग में
स्थित शकुन कोलाहल करे तो हाथी से जीविका करने वाले के साथ समागम तथा
उससे धन और हाथी का लाभ होता है।।१७।।
रजकेन वस्त्ररागकृता समायोगो जलजानां जलोत्पन्नद्रव्याणामागमो लाभश्च भवति।
अतोऽस्मात् परतो हस्त्युपजीविभिर्हस्तिनामनुजीविभिः समाजः संयोगो भवति। अस्माच्च
समाजाद् धनलब्धिर्हस्तिलब्धिश्च भवति।।१७।।
अत्रैव विशेषमाह—
द्वात्रिंशत्प्रविभक्तं दिक् चक्रं वास्तुवत्सनेम्युक्तम्।
अरनाभिस्थैरन्तः फलानि नवधा विकल्प्यानि ॥१८॥
वास्तु की तरह नेमि के साथ यह बत्तीस से विभक्त दिक् चक्र कहा गया है। अब
अर ( चक्र के मध्यवर्ती भाग ) और नाभि ( मध्य भाग ) के मध्य में स्थित शकुन के
द्वारा नव प्रकार से फल की कल्पना करनी चाहिये।।१८।।
दिक् चक्रं दिङ्मण्डलं वास्तुवद्द्वात्रिंशद्भागप्रविभक्तं सनेम्युक्तं नेम्या सह कथितम्।
नेमियुक्तस्यैतत् फलम्। यथा वास्तुबन्धने द्वात्रिंशद्भागप्रविभक्ते वास्तुप्रतिदिशमष्टौ द्वाराणि
विभक्तान्येवं दिक् चक्रमपि विभक्तम्, तत्रैतत्फलम्। अरनाभिस्थैररणीनाभिस्थैः। अराश्चक्रस्य
मध्यवर्तिनः। नाभिर्मध्यं तैररनाभिस्थैः शकुनैरन्तर्मध्ये नवधा नवप्रकारं फलानि विकल्प्यानि
विकल्पनीयानि।।१८।।
तानि चाह—
नाभिस्थे बन्धुसुहृत्समागमस्तुष्टिरुत्तमा भवति।
प्राग्रक्तपट्टवस्त्रागमस्त्वरे नृपतिसंयोगः ॥१९॥
यदि नाभिस्थान में स्थित शकुन हो तो बन्धु और मित्रों के साथ समागम तथा
उत्तम तुष्टि का लाभ होता है। यदि पूर्व भागस्थित अर में शकुन हो तो लाल वस्त्र का
लाभ और राजा के साथ समागम होता है।।१९।।
नाभिस्थे चक्रनाभिस्थे शकुने बन्धुभिः कुटुम्बैः सुहृद्भिर्मित्रैः सह समागमः संयोगो
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