बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०८ बृहत्संहिता
पूर्व दिशा में शकुन हो तो ध्वजचिह्न विशिष्ट स्थान में, आग्नेय कोण में हो तो
अग्निदग्ध स्थान में, दक्षिण में हो तो श्मशान में, नैर्ऋत्य में हो तो गुहा में, पश्चिम में हो
तो जलप्राय स्थान में, वायव्य कोण में हो तो पर्वत पर और उत्तर में शकुन हो तो गह्वर
में संयोग ( शुभ शकुन में संयोग ) तथा भय ( अशुभ शकुन में भय ) जानना चाहिये।
अथवा शुभ शकुन-संसूचित कार्य शुभ स्थान में और अशुभ शकुन-संसूचित कार्य
अशुभ स्थान में होते हैं।।७८।।
पूर्वस्यां दिशि ध्वजश्चिह्नमुपलक्षणम्। आग्नेय्यां दग्धमग्निना दग्धं यत् किञ्चित्।
अथानन्तरं याम्यायां श्मशानं पितृवनम्। नैर्ऋत्यां दरी गुहा। पश्चिमायां जलमुदकम्।
वायव्यां पर्वतो गिरिः। उत्तरस्यां यज्ञो यागः। ऐशान्यां घोषो गह्वरम्। एतेषु स्थानेषु
संयोगभयानि विन्द्याज्जानीयात्। शुभे शकुने केनचित् सह संयोगः। वक्ष्यति च—
ऐन्द्र्यां दिशि शान्तायां विरुवन्नृपसंश्रितागमं वक्ति।
शकुनेष्वेतेषु भयं वक्ष्यति च—
शान्तासु दिक्षु फलमिदमुक्तं दीप्तास्वतोऽभिधास्यामि।
ऐन्द्र्यां भयं नरेन्द्रात् समागमश्चापि शत्रूणाम्।। इति।
अन्यानि वा स्थानविकल्पितानीति। अन्यान्यपराणि वा कार्याणि स्थानवशेन
परिकल्पनीयानि। एतदुक्तं भवति—शुभानि यानि कार्याणि शुभशकुनसंसूचितानि शुभेष्वेव
स्थानेषु भवन्ति। यान्यशुभानि तान्यशुभेष्विति।।७८।।
अन्यदप्याह—
स्त्रीणां विकल्पा बृहती कुमारी
व्यङ्गा विगन्धा त्वथ नीलवस्त्रा।
कुस्त्री प्रदीर्घा विधवा च ताश्च
संयोगचिन्तापरिवेदिकाः स्युः ॥७९॥
पूर्व में बड़ी, आग्नेय कोण में कुमारी, दक्षिण में अङ्गहीन, नैर्ऋत्य कोण में
दुर्गन्धा, पश्चिम में नील वस्त्र वाली, वायव्य कोण में निन्दनीय, उत्तर में लम्बी और
ईशान कोण में रण्डा स्त्री का निवास होता है। विदिशा स्त्रीसंज्ञक.है; अतः कोई आचार्य
ईशान कोण में नील वस्त्र वाली निन्दनीय और वायव्य कोण में लम्बी विधवा स्त्री रहती
है—ऐसा अर्थ करते हैं।
प्रयोजन—पूर्व आदि दिशाओं में शुभ समागम होने पर उन स्त्रियों के साथ चिन्ता
उत्पन्न कराती है, किसी वस्तु की चोरी होने पर चोर भी यही होती है।।७९।।
पूर्वस्यां स्त्रीणां विकल्पा बृहती बृहतकाया स्त्री। आग्नेय्यां कुमारी कन्यका। दक्षिणस्यां
व्यङ्गाऽङ्गहीना। नैर्ऋत्यां विगन्धा दुर्गन्धा। अथशब्द आनन्तर्ये। पश्चिमायां नीलवस्त्रा नीलाम्बरा।
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