बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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अधुनाऽत्रैव विशेषज्ञानार्थमाह—
सुरपतिहुतवहयमनिरृतिवरुणपवनेन्दुशङ्कराः क्रमशः।
प्राच्याद्यानां पतयो दिशः पुमांसोऽङ्गना विदिशः ॥७५॥
इन्द्र, अग्नि, यम, राक्षस, वरुण, वायु, चन्द्रमा, शिव—ये क्रम से पूर्व आदि आठ
दिशाओं के स्वामी होते हैं। उनमें पूर्व आदि दिशा पुरुषसंज्ञक और आग्नेय आदि
विदिशा स्त्रीसंज्ञक हैं।।७५।।
सुरपतिप्रभृतयो देवाः प्राच्याद्यानां दिशां पतयः स्वामिनः। सुरपतिरिन्द्रः, स पूर्वस्यां
दिश्यधिपतिः। हुतवहोऽग्निराग्नेय्यामधिपतिः। यमः पितृपतिर्दक्षिणस्याम्। निर्ऋती राक्षसा-
नामधिपतिर्नैर्ऋत्याम्। वरुणोऽपाम्पतिः पश्चिमायाम्। पवनो वायुर्वायव्याम्। इन्दुश्चन्द्रमा
उत्तरस्याम्। शङ्करो रुद्र ऐशान्याम्। प्रयोजनम्—आगतस्य नरस्य येन वा तद्दिने संयोगस्त-
स्येन्द्रादिपर्यायो नाम तस्य देवस्य भक्तिर्वा हतनष्टादौ चौरद्रव्यस्थानां वा शुभाशुभे शकुने
लाभालाभे स्थानं वा प्रश्ने चिन्तायां तत्र मनसा स्थितिर्वा आतुरे तत्सुरपूजनाच्छान्तिर्वेत्यादि।
दिशः पुमांसोऽङ्गना विदिश इति। दिशः पूर्वाद्याश्चतस्रः पुमांसो मनुष्याः। विदिशश्चत-
स्रोऽङ्गनाः स्त्रियः। तथा च पराशरः—
वर्णानां ब्राह्मणादीनामुत्तरादिदिशः स्मृताः।
ऐशान्याद्याश्च विदिशस्ताः स्त्रीणां परिकीर्तिताः ।।
प्रयोजनम्—दिक्षु स्थिते शकुने प्रष्टरि वा पुरुषकृता चिन्ता तज्जन्म वा। एवं विदिक्षु
स्त्रीजन्मनश्चिन्ता वा हतनष्टादौ चौरज्ञानं च। एषामागमः संयोगो भवति।।७५।।
अथ लेखज्ञानमाह—
तरुतालीविदलाम्बरसलिलजशरचर्मपट्टलेखाः स्युः।
द्वात्रिंशत्प्रविभक्ते दिक्चक्रे तेषु कार्याणि ॥७६॥
अग्रिम अध्याय के 'नैर्ऋत्यां स्त्रीलाभस्तुरगालङ्कारपूतलेखाप्तिः' इत्यादि आठवें
श्लोक में लेख की प्राप्ति कही गई है। वहाँ उस लेख की प्राप्ति किस तरह के पत्र पर
होती है, उसको यहाँ पर स्पष्ट कर रहे हैं। पूर्व दिशा में शकुन हो तो वृक्ष के त्वचा या
पत्ते पर, आग्नेय कोण में शकुन हो तो ताल वृक्ष के पत्ते पर, दक्षिण कोण में शकुन हो
तो खण्डित पत्ते पर, नैर्ऋत्य कोण में शकुन हो तो वस्त्र पर, पश्चिम में शकुन हो तो
कमल के पत्ते पर, वायव्य कोण में शकुन हो तो काण्ड पर, उत्तर कोण में शकुन हो तो
चमड़े पर और ईशान कोण में शकुन हो तो पट्ट पर लेख की प्राप्ति होती है। बत्तीस
भाग किये हुये दिक् चक्र में जो शकुन कहे गये हैं और जो आगे कहे जायेंगे, वे सभी
अपने-अपने लोक में होते हैं।।७६।।
पूर्वमैवेन्द्रानलदिशोर्मध्ये