बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशाकुनाध्यायः ४०५
विरुतो मध्यस्थः स्वपरयोरेव भयं प्राह। सर्व एते त्रयः समविराविणो युगपदुद्भवन्तो मरणं
कथयन्ति प्रवदन्ति।।७२।।
अन्यदप्याह—
वृक्षाग्रमध्यमूलेषु गजाश्वरथिकागमः।
दीर्घाब्जमुषिताग्रेषु नरनौशिबिकागमः ॥७३॥
यदि वृक्ष के अग्रभाग पर शकुन बैठा हो तो गजारूढ़ मनुष्य का, वृक्ष के मध्य में
शकुन बैठा हो तो अश्वारूढ़ मनुष्य का और वृक्ष के मूल में शकुन बैठा हो तो रथारूढ़
मनुष्य का आगमन सूचित करता है। यदि लम्बी वस्तु पर शकुन बैठा हो तो नरारूढ़
मनुष्य का, कमलपुष्प पर बैठा हो तो नाव का और छिन्नाग्र भाग वाले वस्तु पर बैठा हो
तो पालकी का आगमन सूचित करता है।।७३।।
वृक्षाग्रे स्थितः शकुनो गजारूढस्य नरस्यागमं करोति। वृक्षमध्ये स्थितोऽश्वारूढस्य।
वृक्षमूले रथिकस्य रथारूढस्य। दीर्घे आयामिनि वस्तुनि स्थितः शकुनो नरारूढस्य नर-
स्यागमं करोति। अब्जे पद्मादौ स्थितो नाव आगमनं करोति। मुषिताग्रे छिन्नाग्रे स्थितः
शिबिकागमनं युग्यस्यागमनं करोति। युग्यस्थस्येत्यर्थः।।७३।।
अथान्यदप्याह—
शकटेनोन्नतस्थे वा छायास्थे छत्रसंयुते।
एकत्रिपञ्चसप्ताहात् पूर्वाद्यास्वन्तरासु च ॥७४॥
किसी उच्च प्रदेश ( पर्वत आदि ) पर शकुन बैठा हो तो शकटारूढ़ मनुष्य का
और छाया में शकुन बैठा हो तो छत्रसंयुक्त पुरुष का आगमन सूचित करता है। पूर्व आदि
दिशा और आग्नेय आदि विदिशा में पूर्वोक्त शकुन बैठे हों तो क्रम से एक, तीन, पाँच
और सात दिन में शुभाशुभ फल प्रदान करते हैं। जैसे पूर्व दिशा में शकुन बैठे हों तो
एक दिन में तथा उत्तर दिशा में बैठे हों तो सात दिन में शुभाशुभ फल देते हैं। आग्नेय
कोण में शकुन बैठे हों तो एक दिन में, नैर्ऋत्य कोण में बैठे हों तो तीन दिन में, वायव्य
कोण में बैठे हों तो पाँच दिन में और ईशान कोण में शकुन बैठे हों तो सात दिन में
शुभाशुभ फल प्रदान करते हैं।।७४।।
शकटेनोन्नतस्थे। उच्चभागसमवस्थिते पर्वतादौ व्यवस्थिते। शकटेन गन्त्या कश्चिदा-
गच्छति। छायास्थे शकुने छत्रसंयुत आतपत्रेण संयुक्त आगच्छति। तद्यथा—शकुने शुभमशुभं
चोक्तं गन्त्याद्यागमनं वा; तत् कस्मिन् काले भवतीत्याह—एकत्रिपञ्चसप्ताहादिति ।
प्राच्यादिषु दिक्ष्वन्तरासु च विदिक्ष्वेकत्रिपञ्चसप्ताहाद् भवति। पूर्वस्यां दिशि स्थितेन
शकुनेन यत् सूचितं शुभाशुभफलं कस्यचिद् वाऽऽगमनं केनचिद् वा संयोगस्तदेकाहादेकेनैव
दिवसेन भवति। एवं दक्षिणस्यां त्र्यहात्। पश्चिमायां पञ्चाहात्। उत्तरस्यां सप्ताहात्। अन्तरासु
च विदिक्षु, चशब्दादेवमेव। तेनाग्नेय्यामेकाहात्। नैर्ऋत्यां त्र्यहात्। वायव्यां पञ्चाहात्।
ऐशान्यां सप्ताहादिति।।७४।।
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