बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०२ बृहत्संहिता
सर्प, चूहा, बिल्ली और मछली के अतिरिक्त कोई भी शकुन यदि अपनी ही जाति
का मांसभक्षण करने लगे तो दुर्भिक्षकारी होता है।।६५।।
सर्वे शकुनाः स्वजातिपिशिताशिनः स्वजातीनां पिशितं मांसमश्नन्ति भक्षयन्ति,
तथाभूता दुर्भिक्षं कुर्वन्ति, किन्तु सर्प उरगः, मूषक आखुः, मार्जारो बिडालः, पृथुलोमा मत्स्यः।
एतान् वर्जयित्वा एषां सर्वेषां पिशिताशित्वं स्वभाव एव अन्येषामुत्पातः। उक्तं च—
विहाय सर्पाखुविडालमत्स्यान् स्वजातिमांसान्युपभुञ्जते वा।
व्रजन्ति वा मैथुनमन्यजात्याम्....................................................।। इति।।६५।।
अन्यदप्याह—
परयोनिषु गच्छन्तो मैथुनं देशनाशनाः ।
अन्यत्र वेसरोत्पत्तेर्नृणां चाजातिमैथुनात् ॥६६॥
खच्चर की उत्पत्ति को (घोड़े के साथ गदहे के मैथुन से खच्चर की उत्पत्ति होती
है, उसको) तथा मनुष्यों के अजाति मैथुन को छोड़कर कोई शकुन अन्य जाति के
साथ मैथुन करे तो देश का नाश होता है।।६६।।
परयोनिष्वन्ययोनिषु मैथुनं व्रजन्तो गच्छन्तो देशनाशं कुर्वन्ति, किन्तु अन्यत्र वेसरो-
त्पत्तेरिति। वेसरोऽश्वतरस्तदुत्पत्तेस्तत्सम्भवादन्यत्र तां वर्जयित्वा तत्राश्वायां गर्दभो याति।
नृणां पुंसां चाजातिमैथुनादन्यत्र। यतो नरा मनुष्या अजातौ वडवादिशु यान्ति। एवमादिकं
वर्जयित्वा यतस्तदुत्पत्तिरूपं न भवति।।६६।।
अन्यदप्याह—
बन्धघातभयानि स्युः पादोरूमस्तकान्तिगैः ।
शष्पापःपिशितान्नादैर्दोषवर्षक्षयग्रहाः ॥६७॥
पाद, ऊरु और शिर के निकट होकर शकुन चला जाय तो क्रम से बन्धन, घात
और भय को सूचित करता है। घास खाता हुआ शकुन दिखाई दे तो दोष उत्पन्न करने
वाला, जल पीता हुआ दिखाई दे तो वर्षा करने वाला, मांस खाता हुआ दिखाई दे तो
अंगक्षत करने वाला और अन्न खाता हुआ शकुन दिखाई दे तो किसी बन्धु का समागम
कराने वाला होता है।।६७।।
पादोरुमस्तकान्तिगैः शकुनैर्यथाक्रमं बन्धघातभयानि स्युर्भवेयुः, यदा शकुनः पादान्तिगः
पादनिकटे याति तदा बन्धं करोति। अथोरुप्रदेशे ऊर्वोर्निकटे याति, तदा घातमभिघातं
करोति। अथ मस्तके याति, तदा भयं करोति। शष्पापःपिशितान्नादैरिति । शष्पा-
पस्तृणाशी शकुनः नृणां नाशेन दोषं करोति। अपोऽदो जलाशी शकुनो वर्षं वृष्टिं
करोति। पिशितादो मांसभक्षी क्षतमङ्गक्षतं करोति। अन्नादोऽन्नभक्षी ग्रहं संयोगं केनचिद्बन्धुना
सह करोति।।६७।।
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