बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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और चोर स्थित रहते हैं। वायव्य और पश्चिम दिशा के अन्तर्गत प्रदेश के त्रिभाग में
कलाल, पक्षी को मारने वाले और हिंसा करने वाले स्थित रहते हैं।।३१।।
नैर्ऋती दक्षिणपश्चिमा, वारुणी पश्चिमा, अनयोर्मध्ये ये त्रयस्त्रिभागा मध्ये स्थितास्तेषु
प्रथमे प्रमदा स्त्री। द्वितीये सूतिः प्रसवः। तृतीये तस्कराश्चौराः। वायव्यापश्चिमन्तरे ये त्रय-
स्त्रिभागा मध्ये स्थितास्तेषु प्रथमे शौण्डिको मधुपानसक्तः। कल्पपाल इति केचित्। द्वितीये
शाकुनी धीवरः। तृतीये हिंस्रः क्रूरः।।३१।।
अन्येष्व्याह—
विषघातकगोस्वामिकुहकज्ञास्ततः परम्।
धनवानीक्षणीकश्च मालाकारः परं ततः॥३२॥
वायव्य और उत्तर दिशा के अन्तर्गत प्रदेश के त्रिभाग में क्रम से विष को नाश
करने वाले, गोस्वामी (गोमान्) और इन्द्रजाल विद्या जानने वाले स्थित रहते हैं। उत्तर
और ईशान कोण के अन्तर्गत प्रदेश के त्रिभाग में धनी, दैवज्ञ और माली—ये तीन
स्थित रहते हैं।।३२।।
ततः परमनन्तरम्। वायव्योत्तरयोरन्तरे ये त्रयस्त्रिभागाः। तत्र प्रथमे विषघातकः।
विषं घातयति मारयति। द्वितीये गोस्वामी गोमान्। तृतीये कुहकज्ञ इन्द्रजालवित्। ततः
परमुत्तरैशान्योरन्तरे ये त्रयो भागास्तेषु प्रथमे धनवान्। द्वितीये ईक्षणीको दैवज्ञः। तृतीये
मालाकारः पुष्पप्रचायकः।।३२।।
अन्येष्वप्याह—
वैष्णवश्चरकश्चैव वाजिनां रक्षणे रतः।
द्वात्रिंशदेवं भेदाः स्युः पूर्वदिग्भिः सहोदिताः॥३३॥
ईशान कोण और पूर्व दिशा के अन्तर्गत प्रदेश के त्रिभाग में क्रम से वैष्णव, चरक
एवं सहीस—ये तीन स्थित रहते हैं। इस प्रकार पूर्व आदि आठ दिशाओं के बत्तीस भेद
होते हैं।।३३।।
ऐशानीपूर्वयोरन्तरे त्रयस्त्रिभागास्तेषु प्रथमे वैष्णवो विष्णुभक्तः। द्वितीये चरकश्चरः।
तृतीये वाजिनामश्वानां रक्षणे पालने रतः सक्तः। एवमनेनैव प्रकारेण द्वात्रिंशद्भेदाः पूर्वदिग्भिः
प्रागुक्ताभिरष्टाभिर्दिग्भिः सह साकमुदिताः कथिताः स्युर्भवेयुः।।३३।।
अधुनाष्टासु दिक्ष्वधिपतीनाह—
राजा कुमारो नेता च दूतः श्रेष्ठी चरो द्विजः।
राजाध्यक्षश्च पूर्वाद्याः क्षत्रियाद्याश्चतुर्दिशम्॥३४॥
पूर्व आदि आठ दिशाओं के प्रदक्षिणक्रम से राजा, कुमार, सेनापति, दूत, सेठ,
गुप्तचर, ब्राह्मण और गजाध्यक्ष—ये आठ तथा पूर्व आदि चार दिशाओं के क्षत्रिय
आदि (क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, ब्राह्मण) चार अधिपति होते हैं।।३४।।
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