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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 760 में से

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पृष्ठ 405

दन्तकाष्ठलक्षणाध्यायः ३७७
जिस तरफ से भक्षण किये थे उसी तरफ से प्रशान्त दिशा में जाकर दन्तधावन गिरे
तो शुभ और खड़ा हो जाय तो अतिशुभ और इससे उलटा गिरे तो अशुभ होता है। साथ
ही खड़ा होकर गिर जाय तो मिष्टान्न का लाभ कराता है॥९॥
इति 'विमला'हिन्दीटीकायां दन्तकाष्ठलक्षणाध्यायः पञ्चाशीतितमः ॥८५॥
अभिमुखपतितम्। येन भक्षितं तस्यैवाभिमुख्येन सम्मुखं पतितं प्रशान्तदिक्स्थं
प्रशान्तायां च दिशि स्थितं च शुभम्। यदूर्ध्वसंस्थितं तत्र च स्वोध्र्वस्थं भवति, तदति-
शोभनम्। अतोऽस्मात् प्रकारादन्यथा विपर्ययेणानभिमुखं पतितमप्रशान्तदिक्स्थमनूर्ध्वसंस्थितं
न शुभकरं प्रदिष्टमुक्तम्। स्थितपतितं च करोति मृष्टमन्नम्। स्थित्वा यत्पतितं तन्मृष्टमन्नं
करोति विदधाति॥९॥
इति श्रीभट्टोत्पलविरचितायां संहिताविवृतौ दन्तकाष्ठलक्षणं
नाम पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥८५॥