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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 404, कुल 760 में से

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पृष्ठ 404

३७६ बृहत्संहिता
दन्तधावन करे तो अन्न का लाभ, भाण्डीर वृक्ष का दन्तधावन करे तो इसी तरह अधिक
अन्न का लाभ, शमी वृक्ष का दन्तधावन करे तो शत्रुओं को मारने वाला, अर्जुन वृक्ष का
दन्तधावन करे तो भी शत्रुओं का नाश करने वाला और श्यामा के वृक्ष का दन्तधावन
करे तो भी शत्रु को ही मारने वाला होता है।।६।।
नीपे नीपवृक्षेऽर्थाप्तिरर्थलाभो भवति। करवीरेऽन्नलब्धिर्भोजनलाभः। भाण्डीरवृक्षे
प्रभूतं पर्याप्तमन्नमेव स्यात् भवेत्। शम्यां शमीवृक्षे शत्रून् रिपूनपहन्ति नाशयति स कर्ता।
अर्जुनवृक्षे चशब्दाच्छत्रूनेवापहन्ति। श्यामायां च द्विषतां शत्रूणामेव नाशः क्षयो भवति।।६।।
अन्यदप्याह—
शालेऽश्वकर्णे च वदन्ति गौरवं सभद्रदारावपि चाटरूषके।
वाल्लभ्यमायाति जनस्य सर्वतः प्रियङ्गवपामार्गसजम्बुदाडिमैः ॥७॥
शाल और अश्वकर्ण का दन्तधावन सम्मान को बढ़ाने वाला, देवदारू और वासिका
के वृक्ष का दन्तधावन भी सम्मान को बढ़ाने वाला तथा प्रियङ्गु, अपामार्ग, जामुन और
दाडिम के वृक्ष का दन्तधावन चारो तरफ से प्रियता की प्राप्ति कराने वाला होता है।।७।।
शाले शालवृक्षे अश्वकर्णे च गौरवं सम्मानं वदन्ति कथयन्ति। भद्रदारौ देवदारौ।
अपिशब्दः समुच्चये। तथा चाटरूषके वासिकायां चशब्दाद् गौरवमेव वदन्ति। प्रियङ्गुणा-
ऽपामार्गेण सजम्ब्वा जम्बूवृक्षसहितेन दाडिमेन च एतैः सर्वैरिव सर्वतः सर्वस्य वाल्लभ्यं
वल्लभत्वमायात्यागच्छति।।७।।
अथ दन्तकाष्ठलक्षणे विधानमाह—
उदङ्मुखः प्राङ्मुख एव वाब्दं कामं यथेष्टं हृदये निवेश्य।
अद्यादनिन्दन् च सुखोपविष्टः प्रक्षाल्य जह्याच्च शुचिप्रदेशे ॥८॥
उत्तराभिमुख या पूर्वाभिमुख सुखपूर्वक बैठकर वार्षिक यथाभिलषित कामना को
हृदय में रखकर विहित काष्ठ का दन्तधावन करना चाहिये। फिर दन्तधावन को धोकर
पवित्र स्थान में छोड़ देना चाहिये।।८।।
दन्तकाष्ठमुदङ्मुख उत्तराभिमुखः, पूर्वाभिमुखो वा। अब्दं वार्षिकं यथेष्टं यथाभिप्रेतं
काममिच्छां हृदये निवेश्य हृद्यवस्थाप्य अनिन्दन् कुत्सामकुर्वन् सुखोपविष्टः सुखासीनोऽद्याद्
भक्षयेत्। ततः प्रक्षाल्य शुचिप्रदेशे शुचौ शुद्धे प्रदेशे स्थाने जह्यात् परित्यजेत्।।८।।
अथ त्यक्तस्य लक्षणमाह—
अभिमुखपतितं प्रशान्तदिक्स्थं शुभमतिशोभनमूर्ध्वसंस्थितं यत्।
अशुभकरमतोऽन्यथा प्रदिष्टं स्थितपतितं च करोति मृष्टमन्नम् ॥९॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां दन्तकाष्ठलक्षणं
नाम पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥८५॥
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