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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 383, कुल 760 में से

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पृष्ठ 383

पानी के बुलबुले के समान आगे से फटा, चिपटा और वासी फल के समान
लम्बा हीरा शुभ करने वाला नहीं होता। इसलिये इन दोषयुक्त हीरों का मूल्य पूर्वोक्त
मूल्य से अष्टमांश कम हो जाता है।।१६।।
यानि च वज्राणि बुद्बुदानि जलबुद्बुदसदृशानि। दलिताग्राणि दलितं विदारितमग्रं प्रान्तं
येषाम्। चिपिटानि चर्पटानि। वासीफलवत्प्रदीर्घाणि वासिका द्रव्यविशेषः। एतेषां सर्वेषां
प्राग्विधानेन यन्मूल्यं भवति तस्मादष्टमो भागो हानिर्भवति। अष्टमभागोनं मूल्यं भवती-
त्यर्थः।।१६।।
अथ वज्रमणेर्धारणे गुणानाह—
वज्रं न किञ्चिदपि धारयितव्यमेके
पुत्रार्थिनीभिरबलाभिरुशन्ति तज्ज्ञाः।
शृङ्गाटकत्रिपुटधान्यकवत् स्थितं यत्
श्रोणीनिभं च शुभदं तनयार्थिनीनाम् ।।१७।।
हीरा के लक्षणों को जानने वाले पण्डितों का कहना है कि पुत्र चाहने वाली स्त्रियों
को किसी भी प्रकार का हीरा नहीं धारण करना चाहिये। सिंघाड़े की आकृति वाले तीन
पुटों से युक्त, धान्यफल के समान या श्रोणी के समान हीरे को धारण करना पुत्र चाहने
वाली स्त्रियों के लिये शुभदायक होता है।।१७।।
वज्रं वज्रमणिर्बलाभिः स्त्रीभिः पुत्रार्थिनीभिः सुताभिलाषिणीभिर्न किञ्चिदपि
धारयितव्यमित्येके आचार्या उशन्ति कथयन्ति। यच्छृङ्गाटकाकारं त्र्यस्रम्। त्रिपुटं त्रिभिः
पुटैर्युक्तम्। धान्यकबद्द्धान्यकाफलवत्स्थितम्। श्रोणीनिभं रूह्यधररागसदृशम्। तत्तनयार्थिनीनां
शुभदम्। तथा च—
सुतार्थिनीभिर्धन्याभिर्न धार्यं वज्रसंज्ञकम्।
यच्च शृङ्गाटकाकारं त्रिपुटं धान्यवत्स्थितम्।।
श्रोणीनिभं सुवर्णं च स्निग्धं किरणसंयुक्तम्।
तच्छस्तं धारणे स्त्रीणां पुत्रवृद्धिप्रदं स्मृतम्।। इति।।१७।।
अन्यदप्याह—
स्वजनविभवजीवितक्षयं जनयति वज्रमनिष्टलक्षणम्।
अशनिविषभयारिनाशनं शुभमुपभोगकरं च भूभृताम् ।।१८।।
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां रत्नपरीक्षा-
नामाशीतितमोऽध्यायः ॥८०॥
अशुभ लक्षणों से युक्त हीरे को धारण करने से राजाओं के बन्धु, धन और प्राण