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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 374, कुल 760 में से

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पृष्ठ 374

ईषाशब्देन चत्वारि काष्ठानि घटितान्युच्यन्ते। शिरः पादभागयोर्द्वौ वामदक्षिणभागयो-
र्द्वाविति। तेषां परस्परं यत्र संयोगः शिरःपादकाष्ठयोर्द्वे द्वे छिद्रे कृत्वा वामदक्षिणपाद-
काष्ठानि तेषु क्षिपेत्। तत्रायं क्रमः—ईषायोगे दारु प्रदक्षिणाग्रमाचार्यैः प्रशस्तमुक्तम्। प्राद-
क्षण्येनाग्रं यस्मिन्। अपसव्यैकदिगग्र इति। अपसव्येऽप्रदक्षिणस्थे। पूर्वोक्तविन्यस्तस्य
शिरःकाष्ठस्य यदग्रं तत्र दक्षिणदिक्स्थकाष्ठमूलं क्षिपेत्। तस्याग्रे पादान्तभागस्थं काष्ठमूलं
क्षिपेत्। तदग्र उत्तरदिग्भागस्थकाष्ठमूलं क्षिपेत्। तदग्रे शिरःकाष्ठमूलं क्षिपेत्। एवं पूर्वदक्षिण-
पश्चिमोत्तरसंस्थानेन न्यासे कृते प्रदक्षिणाग्रं भवति। अपसव्ये न प्रदक्षिणस्थे पूर्वोक्तन्यासा-
द्विपर्ययस्थे तथैकदिगग्रस्थिते दारौ भूतसञ्जनितं भूतग्रहोत्पन्नं भयं भीतिर्भवति। शिरःपादभाग-
काष्ठयोरेकस्यां दिश्यग्रं यद्भवति तदैकदिगग्रम्॥२७॥
अथ पदानां लक्षणमाह—
एकेनावाक्शिरसा भवति हि पादेन पादवैकल्यम्।
द्वाभ्यां न जीर्यतेऽन्नं त्रिचतुर्भिः क्लेशवधबन्धाः॥२८॥
यदि शय्या या आसन का एक पाया अधोमुख (मूलाग्रविपर्यय = काष्ठ के मूल
में पाये का अग्र भाग या काष्ठ के अग्र भाग में पाये का मूल ) हो तो उस पर सोने वाले
को पाँव में पीड़ा, दो पाये अधोमुख हों तो भुक्त अन्न अजीर्ण और तीन या चार पाये
अधोमुख हों तो क्लेश, वध और बन्धन होता है॥२८॥
एकेन पादेन। अवाक्शिरसा अधोमुखेन। मूलाग्रविपर्ययस्थितेन। पादवैकल्यं स्वामिनो
भवति। द्वाभ्यां पादाभ्यामेवंविधाभ्यामन्नं भुक्तं न जीर्यते न परिणामं याति। त्रिभिश्चतुर्भिश्च
क्लेशवधबन्धा भवन्ति॥२८॥
अथ पादस्य ग्रन्थियुक्तस्य लक्षणमाह—
सुषिरेऽथवा विवर्णे ग्रन्थौ पादस्य शीर्षगे व्याधिः।
पादे कुम्भो यश्च ग्रन्थौ तस्मिन्नुदररोगः॥२९॥
कुम्भादस्ताज्जङ्घा तत्र कृतो जङ्घयोः करोति भयम्।
तस्याश्चाधारोऽधः क्षयकृद्द्रव्यस्य तत्र कृतः॥३०॥
खुरदेशे यो ग्रन्थिः खुरिणां पीडाकरः स निर्दिष्टः।
ईषाशीर्षण्योश्च त्रिभागसंस्थो भवेन्न शुभः॥३१॥
यदि पाये का शिर छिद्रयुत, विवर्ण या ग्रन्थियुत हो तो उस पर सोने वाले को
व्याधि होती है। इसी प्रकार यदि पैर के कुम्भ में गाँठ हो तो उदररोग, जंघा ( कुम्भ के
नीचे भाग ) में गाँठ हो तो जंघाओं में भय, आधार ( जंघा के नीचे का भाग ) में गाँठ
हो तो धन का नाश, खुरप्रदेश में गाँठ हो तो खुर वाले जानवरों को पीड़ा तथा ईषा
( पार्श्व काष्ठ ) और शीर्षणी ( शिर की तरफ का काष्ठ ) के तिहाई पर गाँठ हो तो
कल्याणकारी नहीं होता है॥२९-३१॥