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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 372

३४४ बृहत्संहिता
मधिकमपि प्रोह्य शेषं कल्पयेत्। गिरिचारिणां पर्वतचारिणां न्यूनमपि प्रोह्य शेषं कल्पयेत्।
यतः पर्वतशिलास्तद्दन्तान् घर्षन्ति।।२०।।
अथ गजदन्तस्य कल्पितस्य शुभाशुभमाह—
श्रीवृक्षवर्धनमानच्छत्रध्वजचामरानुरूपेषु ।
छेदे दृष्टेष्वारोग्यविजयधनवृद्धिसौख्यानि ।।२१।।
प्रहरणसदृशेषु जयो नन्द्यावर्ते प्रनष्टदेशाप्तिः ।
लोष्ठे तु लब्धपूर्वस्य भवति देशस्य सम्प्राप्तिः ।।२२।।
स्त्रीरूपे धननाशो भृङ्गारेऽभ्युत्थिते सुतोत्पत्तिः ।
कुम्भेन निधिप्राप्तिर्यात्राविघ्नं च दण्डेन ।।२३।।
कृकलासकपिभुजङ्गेष्वसुभिक्षव्याधयो रिपुवशित्वम् ।
गृध्रोलूकध्वाङ्क्षश्येनाकारेषु जनमरकः ।।२४।।
पाशेऽथवा कबन्धे नृपमृत्युर्जनविपत् स्रुते रक्ते ।
कृष्णे श्यावे रूक्षे दुर्गन्धे चाशुभं भवति ।।२५।।
काटने के समय हाथी के दाँत में यदि बिल्ववृक्ष, वर्धमान, छत्र, ध्वज या चामर
की तरह चिह्न दिखाई दे तो आरोग्य, धन की वृद्धि और सुख प्राप्त होता है। इसी प्रकार
काटते समय यदि शस्त्र के समान चिह्न दिखाई दे तो जय, नदी के आवर्त ( जलभ्रम )
के समान चिह्न दिखाई दे तो नष्ट देश की प्राप्ति, ढेले के समान चिह्न दिखाई दे तो पूर्व
में प्राप्त हुये देश की प्राप्ति, स्त्री के समान चिह्न दिखाई दे तो धन का नाश, भृङ्गार के
समान चिह्न दिखाई दे तो पुत्र की उत्पत्ति, घड़े के समान चिह्न दिखाई दे तो निधि की
प्राप्ति, दण्ड के समान चिह्न दिखाई दे तो यात्रा में विघ्न; गिरगिट, वानर या सर्प की
तरह चिह्न दृष्टिगोचर हो तो दुर्भिक्ष, व्याधि और शत्रु के अधिकार में रहना; गिद्ध, उल्लू,
काक या बाज के समान चिह्न दृष्टिगोचर हो तो मरकी, पाश ( फांसी ) या कबन्ध
( बिना शिर का पुरुष ) के समान चिह्न दृष्टिगोचर हो तो राजा की मृत्यु, काटने पर रक्त
निकलने लगे तो मनुष्यों के ऊपर विपत्ति तथा वह काला, पीला, रूखा या दुर्गन्धियुक्त
हो तो अशुभ करने वाला होता है।।२१-२५।।
श्रीवृक्षवर्धमान इति । श्रीवृक्षः प्रसिद्धः। विल्वः। वर्धमानश्चिह्नम्। वर्धमानो वास्तु-
सदृशं सरागमिति केचित्। छत्रमातपत्रम्। ध्वजः प्रसिद्धो विविधपटविरचितं चिह्नम्।
चामरं बालव्यजनम्। एषामनुरूपेषु सदृशेषु। छेदे दन्तच्छेदे। दृष्टेष्ववलोकितेषु। आरोग्य-
मरोगित्वम्। विजयो विशेषेण जयः। धनवृद्धिर्वित्तवर्धनम्। सौख्यम्। एतानि भवन्ति।
प्रहरणसदृशेष्विति । प्रहरणमायुधादि। प्रहरणसदृशेषु छेदे दृष्टेषु जयो भवति। नन्द्या-
वर्तसदृशं तस्मिन् दृष्टे प्रनष्टस्यापहृतस्य देशस्य प्राप्तिर्लाभो भवति। लोष्ठं मृत्खण्डम्।
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