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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 370

३४२ बृहत्संहिता
यः सर्वः श्रीपर्ण्या इति। यः पर्यङ्कः सर्वो निःशेषं श्रीपर्ण्या निर्मितो रचितः स
धनदाता वित्तप्रदो भवति। यः सर्वोऽसनकृतः स रोगहरो रोगान् हरति विनाशयति। यः
सर्वस्तिन्दुकसारेण रचितः स वित्तकरो धनकरः।
यः केवल इति। यः पर्यङ्कः केवलः शिंशपयैव निर्मितः स बहुविधं बहुप्रकारं
वृद्धिकरः। यः सर्वश्चन्दनमयश्चन्दनविरचितः पर्यङ्कः स रिपुघ्नस्तथा धर्मं यशः कीर्तिं दीर्घं
च जीवितं करोति।
यः पद्मकपर्यङ्क इति। यः सर्वः पद्मकचितः पर्यङ्कः आयुर्जीवितं दीर्घं चिरकाल-
स्थायि। श्रियं लक्ष्मीम्, श्रुतं विद्याशुभं धर्म्यम्, वित्तं धनं कुरुते। तथा शालेन कृतो रचितः
शाकरचितश्च कल्याणं श्रेयः कुरुते।
केवलचन्दनरचितमिति। यत्पर्यङ्कं केवलेनैव चन्दनेन विरचितं निर्मितं तथा काञ्चनेन
सुवर्णेन गुप्तमाच्छादितम्। विचित्रैर्नानाकारै रत्नैर्मणिभिर्युक्तं तन्नृपो राजा अध्यासन्नुपरि
तिष्ठन् विबुधैर्देवैरपि पूज्यतेऽर्च्यते।।११-१४।।
अथ व्यतिमिश्रदारूणां फलमाह—
अन्येन समायुक्ता न तिन्दु की शिंशपा च शुभफलदा ।
न श्रीपर्णेन च देवदारुवृक्षो न चाप्यसनः ॥१५॥
शुभदौ तु शालशाकौ परस्परं संयुतौ पृथक् चैव ।
तद्वत् पृथक् प्रशस्तौ सहितौ च हरिद्रककदम्बौ ॥१६॥
सर्वः स्पन्दनरचितो न शुभः प्राणान् हिनस्ति चाम्बकृतः ।
असनोऽन्यदारुसहितः क्षिप्रं दोषान् करोति बहून् ॥१७॥
अम्बस्पन्दनचन्दनवृक्षाणां स्पन्दनाच्छुभाः पादाः ।
फलतरुणा शयनासनमिष्टफलं भवति सर्वेण ॥१८॥
तिन्दु की और शिंशपा वृक्ष की लकड़ी में किसी अन्य वृक्ष की लकड़ी मिलाकर
तथा श्रीपर्णी वृक्ष की लकड़ी में देवदारु या असन वृक्ष की लकड़ी मिलाकर बने हुये
पलंग या आसन शुभ फल देने वाले नहीं होते हैं। शाल, शाक—इन दोनों वृक्षों की
लकड़ी परस्पर मिली हुई हो या अलग-अलग हो तो भी शुभ फल देने वाली होती है।
इसी तर हरिद्रक और कदम्ब वृक्ष की लकड़ी परस्पर मिली हुई या अलग-अलग होने
पर भी शुभ फल देने वाली होती है। केवल स्पन्दन वृक्ष की लकड़ी से बने हुये
पलंग या आसन शुभ नहीं होते हैं। अम्ब वृक्ष की लकड़ी से बने हुये पलंग या आसन
प्राणनाशक होते हैं। अन्य वृक्षों की लकड़ी से युत असन वृक्ष की लकड़ी से बने हुये
पलंग या आसन शीघ्र ही बहुत दोष उत्पन्न करने वाले होते हैं। अम्ब, स्पन्दन और
चन्दन वृक्षों से बने हुये पलंगों के पाये स्पन्दन वृक्ष की लकड़ी से बनाने पर शुभ होता
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