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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 350

३२२ बृहत्संहिता
पूर्वोक्त द्रव्यों में से नियमानुसार अपनी इच्छा से किन्हीं चार द्रव्यों को लेकर
जायफल, कस्तूरी और कर्पूर से उद्बोधित करके आम के रस से युक्त शहद से सिक्त
करने पर पारिजातपुष्पसदृश गन्ध वाले बहुत तरह के मुखवास बनते हैं।।२७।।
चतुर्भिर्मध्यैरिच्छापरिगृहीतैः स्वेच्छया गन्धानि द्रव्याणि सङ्गृहीतैः। जातीफलमृग-
कर्पूरबोधितैः, जातीफलं प्रसिद्धम्। मृगः कस्तूरिका। कर्पूरः प्रसिद्धः। एतैर्बोधितैः। ससहकार-
मधुसिक्तैः सहकारेण चूतरससंयुक्तेन मधुना माक्षिकेण सिक्तैश्चैवास्मिन् कच्छपुटे बहवः
पारिजाताः पारिजातसदृशगन्धा मुखवासा भवन्ति।।२७।।
अथाधुना स्नानान्याह—
सर्जरसश्रीवासकसमन्विता येऽत्र सर्वधूपास्तैः ।
श्रीसर्जरसवियुक्तैः स्नानानि सबालकत्वग्भिः ॥२८॥
पूर्वकथित कच्छपुट में सर्जरस ( राल ) और श्रीवासक से युत जितने धूप कहे
गये हैं, उनमें श्रीवास और सर्जरस न मिलाकर नेत्रबाला और दालचीनी मिला देने से
अनेक प्रकार के स्नान करने के लिये चूर्ण बन जायेंगे।।२८।।
अत्रास्मिन् कच्छपुटे ये ये धूपाः सर्जरसश्रीवासकसमन्वितास्ते सर्व एव निःशेषाः।
तैरेव सर्वैः प्रागुक्तैः श्रीसर्जरसवियुक्तैः। श्रीवासकेन रहितैः सबालकत्वग्भिः, बालकं हीवेरम्।
त्वक् प्रसिद्धा। सबालकत्वग्भिर्बालकत्वक्सहितैः स्नानानि स्नानीयानि चूर्णानि भवन्ति।।२८।।
अधुना चतुरशीतिकेसरगन्धानाह—
रोध्रोशीरनतागुरुमुस्तापत्रप्रियङ्गुवनपथ्याः ।
नवकोष्ठात् कच्छपुटाद् द्रव्यत्रितयं समुद्धृत्य ॥२९॥
चन्दनतुरुष्कभागौ शुक्त्यर्धं पादिका तु शतपुष्पा ।
कटुगुग्गुलगुडधूप्याः केसरगन्धाश्चतुरशीतिः ॥३०॥
लोध्र, खस, तगर, अगुरु, मुस्ता, गन्धपत्र, प्रियङ्गु, वन ( परिपेलव ), हरीतकी—
इन नव द्रव्यों को लेकर पूर्वकथित रीति से बनाया हुआ नव कोष्ठ के कच्छपुट से क्रम
से तीन-तीन द्रव्य इकट्ठा करके चन्दन एक भाग, सिल्लक एक भाग, शुक्ति आधा भाग
और सौंफ एक भाग का चतुर्थांश मिलाकर कटुका, गुग्गुल और गुड का धूप देने पर
चौरासी प्रकार के बकुलपुष्प के समान गन्ध वाले गन्धद्रव्य बनते हैं।।२९-३०।।
रोध्रोशीरेति । रोध्रः प्रसिद्धः। उशीरं प्रसिद्धम्। नतं तगरम्। अगुरुः प्रसिद्धः। मुस्ता
प्रसिद्धा। पत्रं गन्धपत्रम्। प्रियङ्गुः प्रसिद्धा। वनं परिपेलवम्। पथ्या हरीतकी। एषां प्राग्व-
द्यथाक्रमेण नवकोष्ठके न्यासः। अस्मान्नवकोष्ठात् कच्छपुटाद्यथाक्रमेण द्रव्यत्रितयं त्रीणि
द्रव्याणि समुद्धृत्य सङ्गृह्य ततश्चन्दनतुरुष्कभागौ योज्यौ। चन्दनं मलयजम्, तुरुष्कं सिह्ल-
रसम्। चन्दनस्यैको भागः, तुरुष्कस्यैको भागः। शुक्तिर्नखस्तदर्धम्। शतपुष्पा पादिका
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