बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१६ बृहत्संहिता
कर्पूरकस्य द्वौ। षष्ठो गन्धो भवति। एवमेकैकस्य द्रव्यस्य षड्गन्धा उत्पद्यन्ते। चतुष्कस्य
चतुर्विंशतिः। षोडशकस्य षण्णवतिः।।१३-१४।।
| घ | बा | शै | क |
| उ | ना | व्या | स्पृ |
| अ | द | न | त |
| धा | क | चो | म |
अत्रैव विशेषमाह—
अत्युल्बणगन्धत्वादेकांशो नित्यमेव धान्यानाम् ।
कर्पूरस्य तदूनो नैतौ द्वित्र्यादिभिर्देयौ ॥१५॥
धनियाँ और कर्पूर में अति उत्कट गन्ध होने के कारण सदा धनियाँ का एक भाग
और कर्पूर के एक भाग से भी कम भाग डालना चाहिये। इन दोनों के दो-तीन आदि
भाग कभी नहीं डालना चाहिये; क्योंकि इनमें अति उत्कट गन्ध होने के कारण ये अन्य
द्रव्यों के गन्धों का नाश कर देते हैं।।१५।।
अत्र धान्यानां धान्यकाफलानामत्युल्बणगन्धत्वादुत्कटत्वान्नित्यं सर्वकालमेकांश
एको भागो दातव्यः। कर्पूरस्योल्बणगन्धत्वात् तदूनः तस्माद् भागादप्यूनो दातव्यः। एतौ
द्वौ द्वित्र्यादिभिर्भागैः प्राप्तावपि न देयौ न दातव्यौ। यतस्तदुत्कटत्वादन्यद्रव्याणां गन्धहा-
निर्भवति।।१५।।
अथैतेषां धूपानां बोधनं चाह—
श्रीसर्जगुडनखैस्ते धूपयितव्याः क्रमान्न पिण्डस्थैः।
बोधः कस्तूरिकया देयः कर्पूरसंयुतया ॥१६॥
पूर्वोक्त समस्त गन्धित द्रव्यों को श्रीवास, राल, गुड़, नख-इन चारों का अलग-
अलग धूप दे, सबको मिलाकर नहीं; बाद में कर्पूर और कस्तूरी का बोध दे।।१६।।
श्रीः श्रीवासकः। सर्जः सर्जरसः। गुडनखे प्रसिद्धे। एतैः क्रमात्ते सर्व एव गन्धा
धूपयितव्याः। न पिण्डस्थैर्न मिश्रीकृतैः। एतदुक्तं भवति—प्रथमतः सर्व एव श्रीवासकेन
धूपयितव्याः। तथाभूताः। पुनः सर्जरसेन। ततः सर्वे पुनरपि गुडेन। ततः सर्वे नखेन
धूपयितव्याः। ततः सर्वेषां कस्तूरिकया कर्पूरसंयुतया बोधः कार्यः। एवं कृते शोभनास्ते
गन्धा भवन्ति।।१६।।
अथात्र सर्वगन्धानां व्यापकत्वेन प्रदर्शनार्थमाह—
अत्र सहस्रचतुष्टयमन्यानि च सप्ततिसहस्राणि।
लक्षं शतानि सप्त विंशतियुक्तानि गन्धानाम् ॥१७॥
पूर्वोक्त सुगन्धित द्रव्यों के भेद से कुल मिलाकर १७४७२० प्रकार के सुगन्धित
द्रव्य बनते हैं।।१७।।
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