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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 334, कुल 760 में से

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पृष्ठ 334

३०६ बृहत्संहिता
अन्यदप्याह—
तिलाश्वगन्धाकपिकच्छूमूलैर्विदारिकाषष्टिकपिष्टयोगः ।
आजेन पिष्टः पयसा घृतेन पक्वं भवेच्छष्कुलिकातिवृष्या ॥९॥
तिल, असगन्ध, क्यवांच ( कवाछु ) का जड़, विदारीकन्द—इन सबों को बराबर
लेकर चूर्ण बनाकर सबके तुल्य साठी के चावलों का आटा उसमें मिलाने के पश्चात्
उसको बकरी के दूध में मथकर बकरी के घृत में ही बनाई गई उसकी पूरी प्रचुर शुक्र
उत्पन्न करने वाली होती है॥९॥
तिलाः प्रसिद्धाः । अश्वगन्धा प्रसिद्धैव। कपिकच्छूमूलमात्मगुप्तामूलम्। विदारिका
प्रसिद्धा। षष्टिकः शालिविशेषस्ततः पिष्टः। औषधानामर्धं षष्टिकपिष्टस्य पिष्टेन सहैतेषां
योगः कार्यः। तत आजेन छागेन पयसा क्षीरेण पिष्टः श्लक्ष्णीकृतः। ततो घृतेनाज्येन
शष्कुलिका भक्ष्यप्रकारं पक्वं साधिताऽतिवृष्या बहुशुक्रकरी भवेत् सा।।९।।
अन्यदप्याह—
क्षीरेण वा गोक्षुरकोपयोगं विदारिकाकन्दकभक्षणं वा।
कुर्वन्न सीदेद् यदि जीर्यतेऽस्य मन्दाग्निता चेदिदमत्र चूर्णम् ॥१०॥
गोक्षुरक ( गोखरू ) का चूर्ण या विदारीकन्द का चूर्ण खाकर ऊपर से दूध पान
करने पर यदि यह चूर्ण पच जाय तो पुरुष स्त्री-प्रसङ्ग से क्षीण नहीं होता है। यदि
मन्दाग्नि के कारण नहीं पच सके तो पहले अग्निसन्दीपन के लिये वक्ष्यमाण चूर्ण का
सेवन करना चाहिये।।१०।।
क्षीरेण वा गोक्षुरकोपयोगं कुर्यात्। गोक्षुरकैः सह क्षीरं क्वाथयित्वा पिबेत्। अथवा
विदारिकायाः कन्दस्य मूलस्य क्षीरेण क्वथितस्य भक्षणं कुर्यात्। एवं कुर्वन्न सीदेत्
स्त्रीषु नावसादं याति। यद्यस्य कामुकस्य जीर्यते कामुकत्वं गच्छति तदैवम्। चेच्छब्दो
यद्यर्थे। यदि मन्दाग्निताऽल्पाग्निताऽल्पाग्नित्वं भवति, तदा तस्मिन्निदं वक्ष्यमाणं चूर्णमग्नि-
सन्दीपनम्।।१०।।
तदाह—
साजमोदलवणा हरीतकी शृङ्गवेरसहिता च पिप्पली ।
मद्यतक्रतरलोष्णवारिभिश्चूर्णपानमुदराग्निदीपनम् ॥११॥
अजवायन, नमक, हरें, सोंठ, पीपल—इन सबको सम भाग लेकर चूर्ण बनाने के
पश्चात् उस चूर्ण को मद्य, तक्र, काञ्जी या उष्ण जल के साथ सेवन करने से जठराग्नि
दीपित होती है।।११।।
अजमोदं दीप्यकम्। लवणं सैन्धवम्। हरीतकी पथ्या। हरीतकी अजमोदलवणाभ्यां
सहिता। शृङ्गवेरं शुण्ठी। शृङ्गवेरेण सहिता संयुता पिप्पली। सर्वाण्येतानि सममात्राणि