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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 333, कुल 760 में से

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पृष्ठ 333

कान्दर्पिकाध्यायः ३०५
लीढ्वानु पीत्वा च पयोऽग्निशक्त्या
कामं निकामं पुरुषो निषेवेत् ॥६॥
आँवले के चूर्ण में आँवले के रस की बार-बार भावना देकर सुखाने के पश्चात्
उसमें शहद या मिश्री मिलाकर चाटे और ऊपर से अपनी शक्ति के अनुसार दूध पीकर
पुरुष पर्याप्त स्त्री-प्रसंग कर सकता है॥६॥
धात्रीफलानामामलकानां चूर्ण स्वरसेनामलकरसेनैव सुभावितमतिशयेन भावितम्।
ततः क्षौद्रसिताज्ययुक्तम्। क्षौद्रं माक्षिकम्। सिता शर्करा। आज्यं घृतम्। एतैः सममात्रैः
संयुक्तं कृत्वा द्रवरूपं कृत्वा तल्लीढ्वाऽऽस्वाद्य अनु पश्चादग्निशक्त्या जठराग्निसामर्थ्येन
पयः क्षीरं पीत्वा पुरुषो नरः कामं मैथुनं निकामं पर्याप्तं निषेवेदनुभवेत्॥६॥
अन्यदप्याह—
क्षीरेण बस्ताण्डयुजा शृतेन
सम्प्लाव्य कामी बहुशस्तिलान् यः ।
सुशोषितानत्ति पयः पिबेच्च
तस्याग्रतः किं चटकः करोति ॥७॥
बकरे के अण्ड को दूध में डाल कर काढ़ा बनाने के बाद तिलों में उस दूध की
भावना देकर उसे सुखाकर उन तिलों को खाकर ऊपर से दूध का पान करे तो उसके
सामने चटक ( गंवरा = गंवरैया ) भी क्या कर सकता है?॥७॥
बस्तश्छागः तस्याण्डौ वृषणौ क्षीरेण दुग्धेन बस्ताण्डयुजा बस्ताण्डयुतेन शृतेन
क्वथितेन यः कामी कामुकः बहुशो बहून् वारान् सप्त वारान् यावदित्यर्थः। तिलान्
सम्प्लाव्य प्लावयित्वा ततस्तानेव तिलान् सुशोषितानतिशुष्कान्। अत्ति भक्षयति। पयः
क्षीरं पश्चात् पिबेत् तस्य नरस्याग्रतः पुरतश्चटकः कलविङ्कः किं करोति। बहुस्त्रीगमनम्,
अतीव स्त्रीषु बहुवारं शीघ्रगामी भवतीत्यर्थः॥७॥
अन्यदप्याह—
माषसूपसहितेन सर्पिषा षष्टिकौदनमदन्ति ये नराः ।
क्षीरमप्यनु पिबन्ति तासु ते शर्वरीषु मदनेन शेरते ॥८॥
जिन रातों में घृत के साथ उड़द की दाल के साथ सट्ठी के चावलों का भात खाकर
जो ऊपर से दूध पीता है, वह उन रातों में कामदेव के साथ सोता है॥८॥
ये नरा मनुष्या माषसूपसहितेन सर्पिषा घृतेन षष्टिकौदनं षष्टिशालिभक्तमदन्ति भक्षयन्ति।
क्षीरं दुग्धमनु पश्चात् पिबन्ति यासु शर्वरीषु रात्रिषु तासु नरा मदनेन कामेन सह शेरते
स्वपन्ति। असकृत् स्त्रीगमनादिति॥८॥
बृ० भ० द्वि०-२०
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