बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ कान्दर्पिकाध्यायः
अथ कान्दर्पिकं व्याख्यायते। तत्रादावेव प्रयोजनप्रदर्शनार्थमाह—
रक्तेऽधिके स्त्री पुरुषस्तु शुक्रे नपुंसकं शोणितशुक्रसाम्ये ।
यस्मादतः शुक्रविवृद्धिदानि निषेवितव्यानि रसायनानि ॥१॥
गर्भधारण-काल में रक्त अधिक हो तो कन्या, शुक्र अधिक हो तो पुत्र और दोनों
समान हों तो नपुंसक सन्तान की उत्पत्ति होती है; अतः वीर्य बढ़ाने वाले रसायन का
सेवन कराना चाहिये॥१॥
गर्भाधानकाले स्त्रीपुरुषयो रक्ते शोणितेऽधिके सति गर्भे स्त्री भवति। शुक्रे रेतस्यधिके
पुरुषो नरो भवति। शोणितस्य रक्तस्य शुक्रस्य रेतसश्च साम्ये तुल्यत्वे नपुंसकं भवति।
यस्मादेवमतोऽस्माद्धेतोः शुक्रविवृद्धिदानि रेतसः संवर्धनानि रसायनानि नियोगात्रिषेवि-
तव्यान्यभ्यवहार्याणीति॥१॥
अथ कामस्य बन्धनरज्जुमाह—
हर्म्यपृष्ठमुडुनाथरश्मयः सोत्पलं मधु मदालसा प्रिया ।
वल्लकी स्मरकथा रहः स्रजो वर्ग एष मदनस्य वागुरा ॥२॥
प्रासाद के पृष्ठ, चन्द्रमा के किरण, नीलोत्पल, मद्य, मदालसा-प्रिया, वीणा, कामदेव
की कथा, एकान्त, माला—ये सब कामदेव को बाँधने की रस्सियाँ हैं॥२॥
हर्म्यपृष्ठं गृहपृष्ठम्। उडुनाथरश्मयश्चन्द्रकिरणाः। सोत्पलं नीलोत्पलसहितम्। मधु
मद्यम्। मद्यग्रहणमुपलक्षणार्थं शूद्रमधिकृत्यैतदुक्तम्। ब्राह्मणादेरन्यदभिमतं पानम्। प्रिया
वल्लभा। मदालसा मद्यपानेनालसा क्षीबा। वल्लकी वीणा। स्मरकथा कामकथा। रह
एकान्तो निर्जनस्थानम्। सुरताभिनिवेशश्च। स्रजो मालाः। एष वर्गः समूहो मदनस्य कामस्य
वागुरा बन्धनरज्जुः। अनया रज्ज्वा बध्यत इति॥२॥
अथ शुक्रवृद्धियोगमाह—
माक्षीकधातुमधुपारदलोहचूर्ण-
पथ्याशिलाजतुघृतानि समानि योऽद्यात्।
सैकानि विंशतिरहानि जरान्वितोऽपि
सोऽशीतिकोऽपि रमयत्यबलां युवेव ॥३॥
सोना, मक्खी, शहद, पारा, लौहचूर्ण, हर्रे, शिलाजीत, घृत—इन सबको सम भाग
लेकर चूर्ण करके शहद या घृत के साथ इक्कीस दिन तक खाने से अस्सी वर्ष का वृद्ध
भी युवा की तरह स्त्री में रमण करता है॥३॥
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