बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवास्तुविद्याध्यायः ५
और प्रधान राजपुरुष का घर बनाना चाहिये। साथ ही राजा और युवराज के गृह के
अन्तरतुल्य कञ्चुकी, वेश्या और कलाज्ञाता का घर बनाना चाहिये।।८।।
नृपगृहाणां पञ्चानां सचिवगृहैः पञ्चभिः सह यदन्तरं तत्सामन्तानां माण्डलिकानां
नृपाणां प्रवराणां प्रधानानां राजपुरुषाणां च कार्यम्। एतदुक्तं भवति—नृपसचिवयोः परस्परं
विस्तारस्य विस्तारेण सहान्तरे कृते दैर्घ्यस्य दैर्घ्येण च सहान्तरे कृते यद् भवति तत्पृथुत्वं
दैर्घ्यं सामन्तप्रवरराजपुरुषाणां च कार्यम्। तथा नृपमानस्य युवराजस्य मानेन सह यो
विशेषोऽन्तरं भवति तत्कञ्चुकिनां महत्तरकपतीनां वेश्यानां साधारणस्त्रीणां कलाज्ञानां
कलाप्रवीणानां गेयवाद्यनृत्यचित्रपुस्तकपत्राच्छेदकर्मविदां च कार्यमिति।।८।।
अथाध्यक्षाधिकृतकर्मान्ताध्यक्षदूतानां पञ्च गृहाण्याह—
अध्यक्षाधिकृतानां सर्वेषां कोशरतिसुल्यम्।
युवराजमन्त्रिविवरं कर्मान्ताध्यक्षदूतानाम् ॥९॥
अश्वशाला, गजशाला और गोशाला के अधिकारियों तथा और कार्यों के जो स्वामी
होते हैं, उन सबके लिये कोश या रतिगृह के बराबर गृह बनाना चाहिये। साथ ही कर्म-
शाला के जो स्वामी होते हैं, उनका और दूतों का गृह युवराज और मन्त्री के गृह के
दैर्घ्य-विस्तार का जो अन्तर हो, उसके बराबर दैर्घ्य-विस्तार लेकर बनाना चाहिये।।९।।
स्फुटार्थ चक्र
| ज्ञातयः | हस्त | अङ्गुल | हस्त | अङ्गुल | हस्त | अङ्गुल | हस्त | अङ्गुल | हस्त | अङ्गुल | प्रमाणम् |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| राज्ञः | १०८ | ० | १०० | ० | ९२ | ० | ८४ | ० | ७६ | ० | विस्तारः |
| १३५ | ० | १२५ | ० | ११५ | ० | १०५ | ० | ९५ | ० | दैर्घ्यम् | |
| सेनापतेः | ६४ | ० | ५८ | ० | ५२ | ० | ४६ | ० | ४० | ० | विस्तारः |
| ७४ | १६ | ६७ | १६ | ६० | १६ | ५३ | १६ | ४६ | १६ | दैर्घ्यम् | |
| मन्त्रिणः | ६० | ० | ५६ | ० | ५२ | ० | ४८ | ० | ४४ | ० | विस्तारः |
| ६७ | १२ | ६३ | ० | ५८ | १२ | ५४ | ० | ४९ | १२ | दैर्घ्यम् | |
| राजमहि- | ३० | ० | २८ | ० | २६ | ० | २४ | ० | २२ | ० | विस्तारः |
| षीणाम् | ३३ | १८ | ३१ | १२ | २९ | ६ | २७ | ० | २४ | १२ | दैर्घ्यम् |
| युव- | ८० | ० | ७४ | ० | ६८ | ० | ६२ | ० | ५६ | ० | विस्तारः |
| राजस्य | १०६ | १६ | ९८ | १६ | ९० | १६ | ८२ | १६ | ७४ | १६ | दैर्घ्यम् |
| युवराजा- | ४० | ० | ३७ | ० | ३४ | ० | ३१ | ० | २८ | ० | विस्तारः |
| नुजस्य | ५३ | ८ | ४९ | ८ | ४५ | ८ | ४१ | ८ | ३७ | ८ | दैर्घ्यम् |
| साम- | ४८ | ० | ४४ | ० | ४० | ० | ३६ | ० | ३२ | ० | विस्तारः |
| न्तस्य | ६७ | १२ | ६२ | ० | ५६ | १२ | ५१ | ० | ४५ | १२ | दैर्घ्यम् |
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