बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ सौभाग्यकरणाध्यायः
अथ सौभाग्यकरणं व्याख्यायते। तत्रादावेव सुभगं पुरुषं प्रति विशेषमाह—
जात्यं मनोभवसुखं सुभगस्य सर्व-
माभासमात्रमितरस्य मनोवियोगात्।
चित्तेन भावयति दूरगताऽपि यं स्त्री
गर्भं बिभर्ति सदृशं पुरुषस्य तस्य ॥१॥
सुभग पुरुष के लिये कामदेवसम्बन्धी समस्त सुख श्रेष्ठ होते हैं। स्त्री के मनोवियोग
के कारण दुर्भग पुरुष को सुख का आभासमात्र होता है। दूर में रहती हुई स्त्री भी जिस
पुरुष का ध्यान करती है, उसके समान ही गर्भ धारण करती है।।१।।
सुभगस्य स्त्रीवल्लभस्य पुरुषस्य सर्वं मनोभवसुखं कामजं सुखं जात्यं श्रेष्ठम्।
जात्यमुचितं सर्वं सर्वस्यां नार्याम्। यतः सुभगं पुरुषं सम्भोगे स्त्री निजहृदये आशास्ते,
अन्यत्र मनो न नयति, ततः स्त्रीचित्तं तस्योपरि रज्यते। इतरस्य दुर्भगस्य मनोवियोगात्
चित्तस्यान्यत्र गमनादाभासमात्रम्। अन्तरमननुप्रविश्य यद्भुज्यते तदाभासमात्रम्, न जात्यम्,
स्त्रीमनोवियोगादन्यगतत्वान्मनसः। यतो वक्ष्यति—
मनो हि मूलं हरदग्धमूर्त्तेः।
स्त्री न सुभगं प्रति याति सा च स्त्री दूरगताऽप्यसमीपस्थाऽपि यं पुरुषं चित्तेन मनसा
भावयति चिन्तयति कामयते तस्य पुरुषस्य सदृशं तदाकृतिं गर्भं बिभर्ति धारयति।।१।।
पुरुषस्यात्मा एव स्त्रीषु पुनर्जायत इत्येतत्प्रतिपादयितुमाह—
भङ्क्त्वा काण्डं पादपस्योप्तमुर्व्यां
बीजं वास्यां नान्यतामेति यद्वत्।
एवं ह्यात्मा जायते स्त्रीषु भूयः
कश्चित्तस्मिन् क्षेत्रयोगाद्विशेषः ॥२॥
जिस वृक्ष का कलम या बीज भूमि में बोया जाता है, वही वृक्ष उत्पन्न होता है,
दूसरा नहीं। इसी तरह आधारभूत स्त्री में फिर पुत्ररूप से आत्मा की ही उत्पत्ति होती है।
केवल क्षेत्र के योग से कुछ विशेष होता है। जिस प्रकार क्षेत्र के भेद से वृक्षों में भी
साधारण भेद होता है, उसी तरह स्त्रियों में भी जानना चाहिये।।२।।
पादपस्य वृक्षस्य काण्डं शाखां भङ्क्त्वा उर्व्यां भूमावुप्तं रोपितं यद्वद्यथा नान्यतामेति
बीजं वा वर्षमस्यामुप्तं नान्यतामेति तदेव जायते, एवमनेन प्रकारेण स्त्रीष्वाधारभूतासु
भूयः पुनरेवात्मा जायते उत्पद्यते। तस्मादात्मनि क्षेत्रयोगाद्धेतोः कश्चित् तत्क्षेत्रे विचित्रभावो
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