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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 308, कुल 760 में से

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पृष्ठ 308

२८० बृहत्संहिता
अधुना वस्त्रादीनां दैवत्यप्रविभागेन शुभाशुभफलमाह—
वस्त्रस्य कोणेषु वसन्ति देवा नराश्च पाशान्तदशान्तमध्ये ।
शेषास्त्रयश्चात्र निशाचरांशास्तथैव शय्यासनपादुकासु ॥९॥
नवधा विभक्त वस्त्र के चारो कोनों में देवता, पाशान्त मध्य ( वस्त्र के मूल ) और
दशान्त मध्य ( वस्त्र के अग्र ) में मनुष्य तथा मध्यस्थित तीन भागों में राक्षस की कल्पना
करनी चाहिये। इसी प्रकार शय्या, आसन और पादुका में भी विचार करना चाहिये ।।९।।
वस्त्रस्याम्बरस्य कोष्ठकनवकविभागेन प्रविभक्तस्य कोणेषु चतुर्षु देवाः सुरा वसन्ति।
वस्त्रस्य मूलं पाशान्तः। अग्रं दशान्तः। पाशान्तमध्यभागे दशान्तमध्यभागे च नरा देव-
विशेषा वसन्ति। शेषास्त्रयः कोष्ठकाः सममध्यवर्तिनोऽत्रास्मिन् वस्त्रे निशाचरांशा राक्षस-
भागाः। न केवलं वस्त्रस्यायं प्रविभागो यावच्छय्यायामास्तरणे, आसने, पादुकासु चेति,
वस्त्रस्य मूलाग्रे यथोक्ते तथासने पादुकासु च। आसनस्य वृक्षवशान्मूलाग्रकल्पना। पादुका-
सूपानत्सु पादवन्मूलाग्रे।
नवकोष्ठविभक्तस्य वस्त्रस्य न्यासः—
| देवाः | राक्षसाः | देवाः |
| नराः | राक्षसाः | नराः |
| देवाः | राक्षसाः | देवा |
तथा च गर्गः—
वस्त्रमुत्तरलोमं तु प्राग्देशं नवधा भवेत्।
त्रिधा दशान्तपाशान्ते त्रिधा मध्यं पृथक् पृथक्।।
चतुर्षु कोणेषु सुराः पाशान्ते मध्यमे नराः।
दशान्ते च नरा भूयो मध्यभागे निशाचराः।।
राक्षसान् विनिवृत्त्यैवं शय्यादिष्वप्ययं विधिः।। इति।।९।।
प्रयोजनमाह—
लिप्ते मषीगोमयकर्दमाद्यैश्छिन्ने प्रदग्धे स्फुटिते च विन्द्यात् ।
पुष्टं नवेऽल्पल्पतरं च भुक्ते पापं शुभं चाधिकमुत्तरीये ॥१०॥
यदि नवीन वस्त्र स्याही, गोबर, कीचड़ आदि से लिप्त हो जाय, जल जाय या फट
जाय तो सम्पूर्ण अशुभ या शुभ फल जानना चाहिये। यदि मध्यम वस्त्र हो तो थोड़ा
और बिल्कुल पुराना वस्त्र हो तो बहुत थोड़ा अशुभ या शुभ फल जानना चाहिये; किन्तु
ओढ़ने के वस्त्र हों तो अधिक अशुभ या शुभ फल होता है।।१०।।
वस्त्रं मष्या कज्जलेन गोमयेन कर्दमेन चालिप्ते। आदिग्रहणाद्येन केनचिद् वर्णकेन
लिप्ते। तथा छिन्ने प्रकल्पिते। प्रदग्धेऽग्निना प्लुष्टे। स्फुटिते पाटिते च विन्द्याद् जानीयात्
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