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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 304

२७६ बृहत्संहिता
सुखैर्धनैश्च विरहिता वर्जिताश्च भवन्ति। तथा च—
क्रव्यादासदृशैश्चिह्नः काकोलूकसमप्रभैः।
शुष्कैः करालैर्विषमैः करैर्दुःखान्विताः स्त्रियः।। इति।।२२।।
अन्यदप्याह—
या तूत्तरोष्ठेन समुन्नतेन रूक्षाग्रकेशी कलहप्रिया सा।
प्रायो विरूपासु भवन्ति दोषा यत्राकृतिस्तत्र गुणा वसन्ति ॥२३॥
जिस स्त्री के ऊपर का ओठ ऊँचा हो या केशों के अग्र भाग रूखे हों, वह कलह-
प्रिया होती है। अधिकतर कुरूपा स्त्रियों में दोष और सुन्दरी में गुण होते हैं।।२३।।
या तु स्त्री समुन्नतेनोच्चतरेणोत्तरोष्ठेनोपलक्षिता। रूक्षाग्रकेशी रूक्षा अग्रकेशा यस्याः
सा नित्यं कलहप्रिया कलहकरी भवति। तथा च—
या तूत्तरोष्ठेनोच्चेन केशाग्रं स्नेहवर्जितम्।
यस्याः सा दुःखिता नित्यं भर्तुर्निधनकारिणी।।
प्रायो विरूपास्विति। प्रायो बाहुल्येन विरूपासु विगतरूपासु स्त्रीषु दोषा भवन्ति।
यत्र यस्यां साऽऽकृतिः शोभना भवति तत्र तस्यां गुणा वसन्ति।।२३।।
अधुना शरीरक्षेत्रविभागमाह—
पादौ सगुल्फौ प्रथमं प्रदिष्टौ जङ्घे द्वितीयं तु सजानुचक्रे।
मेढ्रोरुमुष्कं च ततस्तृतीयं नाभिः कटिश्चैव चतुर्थमाहुः ॥२४॥
उदरं कथयन्ति पञ्चमं हृदयं षष्ठमतस्तनान्वितम्।
अथ सप्तममंसजत्रुणी कथयन्त्यष्टममोष्ठकन्धरे ॥२५॥
नवमं नयने च सभ्रूणी सललाटं दशमं शिरस्तथा।
अशुभेष्वशुभं दशाफलं चरणाद्येषु शुभेषु शोभनम् ॥२६॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां कन्यालक्षणं
नाम सप्ततितमोऽध्यायः ॥७०॥
अब कालिक शुभाशुभ फल-ज्ञान के लिये शरीर के दश भाग कहते हैं। जैसे-
गुल्फसहित पाँव पहला भाग; जानुचक्रसहित जंघा दूसरा भाग; लिंग, ऊरु और अण्डकोश
तीसरा भाग; नाभि और कमर चौथा भाग; उदर पाँचवाँ भाग; स्तनसहित हृदय छठा
भाग; कन्धे और कन्धे की सन्धि सातवाँ भाग; ओठ और कण्ठ आठवाँ भाग; भ्रूसहित
नेत्र नवाँ भाग तथा ललाटसहित शिर दशवाँ भाग होता है। इसी तरह परमायु ( १२० )
का भी दश भाग करना चाहिये। यदि अंग का प्रथम भाग शुभ लक्षणों से युत हो तो