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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 302, कुल 760 में से

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पृष्ठ 302

२७४ बृहत्संहिता
बुरे स्वभाव वाली होती है तथा जिसके हँसने के समय गालों में गड्ढे पड़ जाते हों, वह
व्यभिचारिणी होती है।।१९।।
यस्याः स्त्रिया नेत्रे चक्षुषी केकरे कातरे पिङ्गले कपिले वा सा दुःशीला असाध्वी
भवति। तथा श्यावे श्याववर्णे लोले चञ्चले चलमाने ईक्षणे चक्षुषी यस्याः सापि दुःशीला
भवति। तथा च—
पारावताक्षी या कन्या कातराक्षी तथापि या।
उद्भ्रान्तचपलाक्षी च तां कन्यां वर्जयेद् बुधः।।
कूपौ यस्या इति। यस्या योषितः स्मितेषु हसितेषु गण्डयोर्मुखगण्डयोः कूपौ गर्त्ता-
कारौ भवतश्छिद्रे दृश्येते तां स्त्रियं निःसन्दिग्धमसंशयं बन्धकीमसाध्वीं वदन्ति कथयन्ति।
तथा च—
यस्यास्तु हसमानाया जायन्ते गण्डकूपकाः।
भर्तारं हन्ति सा क्षिप्रं नैकत्र रमते चिरम्।।
तथा च पराशरः—
यस्या हसन्त्या दृश्यन्ते कूपका गण्डयोर्द्वयोः।
स्थूलकाकारगण्डा च विकृतास्या महाशना।।
एकापि यस्या न महीं संस्पृशेच्चरणाङ्गुली।
तलमध्यमधो यस्या अधमां तां विनिर्दिशेत्।। इति।।१९।।
अन्यदप्याह—
प्रविलम्बिनि देवरं ललाटे श्वशुरं हन्त्युदरे स्फिचोः पतिं च।
अतिरोमचयान्वितोत्तरोष्ठी न शुभा भर्तुरतीव या च दीर्घा ।।२०।।
जिस स्त्री का ललाट लम्बा हो वह अपने देवर का, उदर लम्बा हो वह अपने
श्वसुर का और स्फिक् ( कुल्ला = कटिप्रोथ ) लम्बा हो वह अपने पति का वध करती
है तथा जिसके ऊपरी ओठ में अधिक रोम हों और जो बहुत लम्बी हो, वह पति के
लिए शुभदायक नहीं होती है।।२०।।
ललाटे मुखपृष्ठभागे प्रविलम्बिनि लम्बमाने देवरं भर्तुर्भ्रातरं हन्ति मारयति। उदरे
प्रविलम्बिनि श्वशुरं भर्तुः पितरं हन्ति। स्फिचोः प्रविलम्बमानयोः पतिं भर्तारं हन्ति।
तथा च—
त्रीणि यस्याः प्रलम्बन्ते ललाटमुदरं स्फिजम्।
त्रींश्च सा पुरुषान् हन्ति देवरं श्वशुरं पतिम्।।
अतिरोमचयान्वितोत्तरोष्ठीति। अतिरोमचयेन रोम्णां सञ्चयेनान्वितः संयुक्त उत्तरोष्ठो
यस्याः सा भर्तुः पत्युर्न शुभा। अतीव या च दीर्घाऽत्युच्चा सापि भर्तुर्न शुभदा। तथा च—
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