बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकन्यालक्षणाध्यायः २७३
सूखी, रोमों से युत या अधिक पुष्ट जंघा, वामावर्त्त रोमों से युत, निम्न और छोटी भग
तथा घड़े के समान पेट दुःख भोगने वाली स्त्रियों की होती है।।१७।।
जङ्घे जानुनोरधोभागौ। उद्बद्धाभ्यामूर्ध्वलग्नाभ्यां पिण्डिकाभ्यामुपलक्षिते। जङ्घापश्चिमभागः
पिण्डिकाशब्दवाच्यः। तथा शिराले शिरासन्तते। शुष्के निर्मांसे। रोमशे लोमबहुले। तथा
चातिमांसे मांसबहुले अतिदुःखितानां महादुःखसन्तप्तानां स्त्रीणां भवतः। तथा च—
शुष्के जङ्घेऽतिमांसे वा रोमशे चोर्ध्वपिण्डिके।
यस्याः सा दुःखिता नित्यं पुत्रवित्तविवर्जिता।।
वामावर्त्तमिति। गुह्यं भगं वामावर्त्तं वामावर्त्तै रोमभिः संयुक्तं निम्नमनुच्चमल्पं चाति-
सङ्कटं दुःखितानां भवति। तथा च—
वामावर्त्तं भगं यस्या दीर्घं चुल्लीसमप्रभम्।
निम्नं वा तेन दोषेण वेश्यास्त्रीत्वं च गच्छति।।
कुम्भाकारमिति। उदरं कुम्भाकारं घटाकारं दुःखितानामेव भवति। तथा च—
लम्बोदरी च या कन्या दीर्घोदरसमन्विता।
भग्नोदरा च दुःखान्ता दासीभावमवाप्नुयात्।। इति।।१७।।
अथ ग्रीवालक्षणमाह—
ह्रस्वयातिनिःस्वता दीर्घया कुलक्षयः।
ग्रीवया पृथूत्थया योषितः प्रचण्डता ।।१८।।
छोटी गरदन वाली स्त्री निर्धन, बहुत लम्बी गरदन वाली कुलक्षय करने वाली और
मोटी गरदन वाली स्त्री क्रूर प्रकृति की होती है।।१८।।
ग्रीवया शिरोधरया। अतिह्रस्वया अतिप्रमाणहीनया। निःस्वता निर्धनता भवति। अति-
दीर्घया प्रमाणाधिकया कुलक्षयो वंशविनाशः। पृथूत्थया पृथूत्पन्नया चर्षटया ग्रीवया योषितः
स्त्रियाः प्रचण्डता क्रूरता भवति। तथा च—
कुलक्षयकरी दीर्घा ग्रीवा ह्रस्वा च निर्धना।
पृथूत्थया प्रचण्डत्वं ग्रीवया योषितो वदेत्।। इति।।१८।।
अथ नेत्रगण्डयोर्लक्षणमाह—
नेत्रे यस्याः केकरे पिङ्गले वा
सा दुःशीला श्यावलोलेक्षणा च।
कूपौ यस्या गण्डयोश्च स्मितेषु
निःसन्दिग्धं बन्धकीं तां वदन्ति ।।१९।।
जिस स्त्री के नेत्र केकर ( कञ्जा = ऐंचाताना ), पीले, श्याम या चञ्चल हों, वह
बृ० सं० द्वि०-१८
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