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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 292, कुल 760 में से

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पृष्ठ 292

अथ कन्यालक्षणाध्यायः
अथ कन्यालक्षणं व्याख्यायते। तत्रादावेव पादलक्षणम्—
स्निग्धोन्नताग्रतनुताम्रनखौ कुमार्याः
पादौ समोपचितचारुनिगूढगुल्फौ।
श्लिष्टाङ्गुली कमलकान्तितलौ च यस्या-
स्तामुद्वहेद् यदि भुवोऽधिपतित्वमिच्छेत् ॥१॥
जिस कन्या के पाँव स्निग्ध, ऊँचे, आगे से पतले और लाल नखों से युत, समान,
पुष्ट, सुन्दर और छिपे हुये गुल्फ वाले, मिली हुई अंगुली वाले तथा कमल की कान्ति
के समान कान्ति वाले हों; उससे पृथ्विपतित्व की कामना रखने वाले मनुष्य को विवाह
करना चाहिये॥१॥
यस्याः कुमार्याः कन्यकायाः। पादौ चरणौ। स्निग्धोन्नताग्रतनुताम्रनखौ स्निग्धौ सस्नेहा-
वुन्नतावुच्चौ कूर्मपृष्ठौ, अग्रे तनू ययोः। ताम्रनखौ रक्तवर्णौ नखौ ययोः। समोपचितचारु-
निगूढगुल्फौ समौ तुल्यावुपचितौ समांसलौ चारू दर्शनीयौ निगूढावनुल्बणौ गुल्फौ
ययोः। तथाश्लिष्टाङ्गुली श्लिष्टा घना अङ्गुल्यः पादशाखा ययोः। कमलकान्तितलौ कमलस्य
पद्मस्येव कान्तिस्तले ययोः। तथाभूतौ पादौ यदि भुवो भूम्या अधिपतित्वं राज्यमिच्छेत्
तदा तामुद्वहेत्॥१॥
पुनरपि पादजङ्घाजानूरुगुह्यमणीनां लक्षणमाह—
मत्स्याङ्कुशाब्जयववज्रहलासिचिह्ना-
वस्वेदनौ मृदुतलौ चरणौ प्रशस्तौ।
जङ्घे च रोमरहिते विशिरे सुवृत्ते
जानुद्वयं सममनुल्बणसन्धिदेशम् ॥२॥
ऊरू घनौ करिकरप्रतिमावरोमा-
वश्वत्थपत्रसदृशं विपुलं च गुह्यम्।
श्रोणीललाटमुरुकूर्मसमुन्नतं च
गूढो मणिश्च विपुलां श्रियमादधाति ॥३॥
जिस कन्या के पसीने से रहित कोमल पादतल में मत्स्य, अंकुश, कमल, जौ,
वज्र, हल और खड्ग के समान रेखा हो; रोमहीन नाड़ियों से रहित, सुन्दर और गोल
जङ्घा हो; स्थूल सन्धि वाले समान जानु हों; घने, हाथी के सूँड़ के समान और रोमरहित
ऊरु हो; पीपल के पत्ते के समान विस्तीर्ण भग हो; कछुये के पृष्ठ के समान विस्तीर्ण
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