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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 264

२३६ बृहत्संहिता
छायां महाभूतकृतां च सर्वे निर्व्यञ्जयन्ति स्वदशामवाप्य।
क्वम्ब्वग्नवाय्वम्बरजान् गुणांश्च नासास्यदृक्त्वक्श्रवणानुमेयान्।। इति।।८९।।
तत्रादावेव पार्थिवच्छायालक्षणमाह—
स्निग्धद्विजत्वङ्नखरोमकेशाश्छाया सुगन्धा च महीसमुत्था।
तुष्ट्यर्थलाभाभ्युदयान् करोति धर्मस्य चाहन्यहनि प्रवृत्तिम् ॥९०॥
जिस प्राणी के दाँत, त्वचा, नख, रोम और शिर के बाल स्निग्ध तथा शरीर
सुगन्धित हो, उसके ऊपर भूमि की छाया जाननी चाहिये। भूमि की छाया पुष्टि, धन-
लाभ, अभ्युदय और प्रति दिन धर्म में प्रवृत्ति कराती है॥९०॥
महीसमुत्था भूमिजा छाया यस्य जन्तोर्भवति यदा, तदा तस्य द्विजा दन्ताः, त्वक्
चर्म, नखाः, कररुहाः, रोमाण्यङ्गजानि, केशा मूर्धजाः। एते सर्व एव स्निग्धाः सस्नेहा
भवन्ति। तथा सा छाया शरीरकान्तिः सु