बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
पृष्ठ 261, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ेंशरीर के जो-जो अंग रूखे, मांसरहित और नाड़ियों से व्याप्त हों, वे सभी अशुभ
कहे गये हैं तथा इनसे विपरीत (स्निग्ध, मांसयुत और नाड़ियों से रहित) अंग शुभ
होते हैं॥८३॥
यद्गात्रमवयवं रूक्षमस्निग्धं मांसविहीनं निर्मांसं शिरावनद्धं शिरासन्ततं तत्तद्गात्रमनिष्ठमशुभं
प्रोक्तं कथितम्। अतोऽस्माद्विपरीतं सर्वं निःशेषं शुभं स्निग्धं समांसमशिरालमित्यर्थः॥८३॥
अधुना महापुरुषलक्षणमाह—
त्रिषु विपुलो गम्भीरस्त्रिष्वेव षडुन्नतश्चतुर्ह्रस्वः।
सप्तसु रक्तो राजा पञ्चसु दीर्घश्च सूक्ष्मश्च ॥८४॥
जिसके तीन अंग विस्तीर्ण, तीन गम्भीर, छः ऊँचे, चार छोटे, सात लाल और पाँच
अंग लम्बे या सूक्ष्म हों, वह पुरुष राजा होता है॥८४॥
यस्त्रिष्वङ्गेषु विपुलो विस्तीर्णः। गम्भीरस्त्रिष्वेव। षडुन्नतः षड् उन्नतानि यस्य। चतुर्ह्र-
स्वश्चत्वारि ह्रस्वानि यस्य। सप्तसु रक्तो लोहितः। पञ्चसु दीर्घश्चायामी। पञ्चस्वेव सूक्ष्मश्च
स राजा नृपो भवति॥८४॥
अथैतेषामेव प्रविभागमाह—
नाभी स्वरः सत्त्वमिति प्रशस्तं गम्भीरमेतत्त्रितयं नराणाम्।
उरो ललाटं वदनं च पुंसां विस्तीर्णमेतत्त्रितयं प्रशस्तम् ॥८५॥
वक्षोऽथ कक्षा नखनासिकास्यं कृकाटिका चेति षडुन्नतानि।
ह्रस्वानि चत्वारि च लिङ्गपृष्ठं ग्रीवा च जङ्घे च हितप्रदानि ॥७६॥
नेत्रान्तपादकरतालवधरोष्ठजिह्वा
रक्ता नखाश्च खलु सप्त सुखावहानि।
सूक्ष्माणि पञ्चदशनाङ्गुलिपर्वकेशाः
साकं त्वचा कररुहा न च दुःखितानाम् ॥८७॥
हनुलोचनबाहुनासिकाः स्तनयोरन्तरमत्र पञ्चमम्।
इति दीर्घमिदं तु पञ्चकं न भवत्येव नृणामभूपताम् ॥८८॥
पुरुषों के नाभि, शब्द, सत्त्व (एक प्रकार का चित्त का गुण = अविकारं सत्त्वं
व्यसनाभ्युदयागमे)—इन तीन का गम्भीर होना तथा छाती, ललाट, मुख—इन तीन
का विस्तीर्ण होना श्रेष्ठ होता है। पुरुषों के छाती, कक्षा, नख, नासिका, मुख, कृका-
टिका (घेंटू)—ये ६ अंग ऊँचे तथा लिंग, पीठ, गरदन, जंघा—ये चार छोटे हों तो
शुभ देने वाले होते हैं। पुरुषों के नेत्रान्त भाग, पादतल, हाथ, तालु, अधर, जीभ, नख—
ये सात अंग रक्त वर्ण हों तो सुख देने वाले होते हैं। दाँत, अंगुलियों के पर्व, केश,
त्वचा, नख—ये पाँच अंग सूक्ष्म दुःखियों के नहीं होते अर्थात् जिनके ये अंग सूक्ष्म हों,