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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 760 में से

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पृष्ठ 254

२२६ बृहत्संहिता
जो छींकने के समय केवल एक बार छींके वह धनी तथा दो-तीन बार मिला हुआ
हृादि ( बोलते हुये बहुतों के मध्य में जो सुनाई दे ), सानुनाद ( अतिदीर्घ ) और पूर्वोक्त
संहत ( आदि, मध्य तथा अन्त में समान ) छींकने वाले मनुष्य दीर्घायु होते हैं।।६३।।
धनिनामीश्वराणां क्षुतं नासाशब्दितं सकृदेकवारं द्वित्रिपिण्डितं द्विगुणितं त्रिगुणितम्।
एवं केचित्। अन्ये पुनर्व्याचक्षते। धनिनामीश्वराणां क्षुतं सकृदेकवारमेव भवति। दीर्घायुषमुद्दिश्य
द्वित्रिपिण्डितमेकीकृतं हृादि सानुनादं प्रमुक्तं संहतं चेति। ये दीर्घायुषः चिरजीविनस्तेषां
द्विपिण्डितं द्विगुणितम्, त्रिपिण्डितं त्रिगुणितं भवति। तथा हृादि युगपद् बहूनां जल्पतामुपहृत्य
योऽधिकं श्रूयते स हृादि। तथा सानुनादं दूरादपि शनैः शनैरुच्चार्यमाणः श्रुतिपथं याति
सोऽनुनादः। तथा प्रमुक्तमतिदीर्घम्। संहतं चैवमनेन प्रकारेण विज्ञेयं ज्ञातव्यम्। तत्रोदीरितः—
आदिमध्यावसानेषु तुल्यो यः स च संहतः।
क्रोधहर्षव्याधिभयादिष्वविकृतः श्रोत्रपथं याति यः स स्निग्धः। यतः सर्वजनमनोऽभिप्रेतः
स रक्तः। एतदेव व्याख्यानं शोभनम्। यस्मात् पराशरः—
सकृत् क्षुतं भोगवतां द्विर्धनाय चिरायुषे।
चतुः स्याद्भोगनाशाय परमस्मात् तदीशजाः।। इति।।६३।।
अथ लोचनलक्षणमाह—
पद्मदलाभैर्धनिनो रक्तान्तविलोचनाः श्रियो भाजः।
मधुपिङ्गलैर्महार्था मार्जारविलोचनैः पापाः ।।६४।।
हरिणाक्षा मण्डललोचनाश्च जिह्मेश्च लोचनैश्चौराः।
क्रूराः केकरनेत्रा गजसदृशविलोचनाश्चमूपतयः ।।६५।।
ऐश्वर्यं गम्भीरैर्नीलोत्पलकान्तिभिश्च विद्वांसः।
अतिकृष्णतारकाणामक्ष्णामुत्पाटनं भवति ।।६६।।
मन्त्रित्वं स्थूलदृशां श्यावाक्षाणां भवति सौभाग्यम्।
दीना दृग् निःस्वानां स्निग्धा विपुलार्थभोगवताम् ।।६७।।
कमलदल के समान नेत्र वाले पुरुष धनी, लाल नेत्रान्त वाले लक्ष्मीवान, शहद
के समान पीले नेत्र वाले धनी, बिल्ली के समान ( कञ्जे = कुहर ) नेत्र वाले पापी,
हरिण के समान गोल और अचल नेत्र वाले चोर, नीले नेत्र वाले क्रूर, हाथी के समान
नेत्र वाले सेनापति, गहरे नेत्र वाले ऐश्वर्यशाली तथा नीलकमलदल के समान नेत्र वाले
पुरुष विद्वान् होते हैं। अति काले तारा वाले नेत्र उखाड़े जाते हैं। मोटे नेत्र वाले मन्त्री,
कपिल वर्ण के नेत्र वाले भाग्यशाली, दीन नेत्र वाले निर्धन तथा स्थूल नेत्र वाले पुरुष
धनी एवं भोगी होते हैं।।६४-६७।।
पद्मदलाभैः कमलसदृशलोचनैर्धनिनो वित्तान्विता भवन्ति। रक्तान्तविलोचना रक्ता
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