बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०८ बृहत्संहिता
भोगवान् स तु विज्ञेयो गवाढ्यो नात्र संशयः।
बहुधारे तथा रूक्षे सशब्दे पुरुषाधमः।। इति।।१०-१३।।
अधुना बस्तिशुक्रमैथुनानां लक्षणमाह—
परिशुष्कबस्तिशीर्षैर्धनरहिता दुर्भगाश्च विज्ञेयाः।
कुसुमसमगन्धशुक्रा विज्ञातव्या महीपालाः ।।१४।।
मधुगन्धे बहुवित्ता मत्स्यसगन्धे बहून्यपत्यानि।
तनुशुक्रः स्त्रीजनको मांससगन्धो महाभोगी ।।१५।।
मदिरागन्धे यज्वा क्षार सगन्धे च रेतसि दरिद्रः।
शीघ्रं मैथुनगामी दीर्घायुरतोऽन्यथाऽल्पायुः ।।१६।।
जिनके बस्ति (नाभि और लिङ्ग के मध्यभाग) के ऊपर का भाग मांसरहित हो,
वे निर्धन और सबके लिये अप्रिय होते हैं। जिनके वीर्य में पुष्प के समान गन्ध हो, वे
राजा होते हैं। जिनके वीर्य में शहद के समान गन्ध हो, वे बहुत धनी होते हैं। जिनके
वीर्य में मछली के समान गन्ध हो, वे बहुत सन्तान वाले होते हैं। जिनका थोड़ा वीर्य
होता है, वे कन्याओं के पिता होते हैं। जिनके वीर्य में मांस के समान गन्ध हो, वे
अधिक भोगी होते हैं। वीर्य में मद्य के समान गन्ध हो तो यज्ञ करने वाला, खार के
तुल्य गन्ध हो तो निर्धन, शीघ्र मैथुन करने वाला दीर्घायु और देर तक मैथुन करने वाला
अल्पायु होता है।।१४-१६।।
परिशुष्केति। नाभिलिङ्गयोरन्तरं बस्तिः। परिशुष्कं निर्मासं बस्तिशीर्षं येषां ते
धनरहिता दरिद्रा दुर्भगा जनानामप्रिया विज्ञेया विज्ञातव्याः। अर्थादेवं सम्पूर्णबस्तिशीर्षाः
सुभगाः। तथा च—
विस्तीर्णमांसला स्निग्धा बस्तिः पुंसां प्रशस्यते।
निर्मांसा कर्कशा रूक्षा दुःखदारिद्र्यदा स्मृता।।
गोमायोः सदृशी यस्य खरोष्ट्रमहिषस्य च।
स भवेद् दुःखितो नित्यं धनहीनश्च मानवः।।
कुसुमसमं पुष्पतुल्यं शुक्रगन्धं रेतःसुरभिर्येषां ते महीपाला राजानो विज्ञातव्याः।
मधु माक्षिकम्। मधुतुल्यगन्धे शुक्रे बहुवित्ताः प्रभूतधनाः। मत्स्यसगन्धे मीनसदृशगन्धे
बहूनि प्रभूतानि अपत्यानि सुतादयो भवन्ति। तनुशुक्रोऽघनरेताः स्त्रीजनकः कन्यानां पिता
भवति। मांससगन्धे मांससदृशगन्धे महाभोगी भोगवान् भवति।
मदिरागन्धे मद्यगन्धे शुक्रे यज्वा याज्ञिको भवति। क्षार सगन्धे क्षारतुल्यगन्धे च रेतसि
शुक्रे दरिद्रो निःस्वो भवति। तथा च—
पुष्पगन्धो भवेद्राजाः बहुस्वा मधुगन्धिनः।
मत्स्यगन्धः पुत्रवान् स्यात् स्त्रीप्रजास्तनुरेतसः।।
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