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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 231, कुल 760 में से

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पृष्ठ 231

पुरुषलक्षणाध्यायः २०३
श्लिष्टाङ्गुली घनाङ्गुलियुक्तौ। रुचिरताम्रनखौ रुचिरास्तेजस्विनस्ताम्रवर्णा लोहिता नखाश्च
ययोः। केचित् चिरपार्श्वनखाविति पठन्ति। रुचिरौ पार्श्वौ ययोः। सुपार्ष्णी शोभनपाष्णीं।
पाणिंशब्देन पश्चात्पादभाग उच्यते। उष्णावुष्णयुक्तौ। शिराविरहितौ शिराभिर्वर्जितौ। सुनि-
गूढगुल्फौ निगूढौ निमग्नावनुल्बणौ गुल्फौ ययोः। कूर्मोन्नतौ कूर्मपृष्ठाकारौ। तथाभूतौ चरणौ
मनुजेश्वरस्य। मनुजा मनुष्यास्तेषामीश्वरः प्रभुः। तथा च समुद्रः—
पादैः समासैः सुस्निग्धैः सोष्णैः श्लिष्टैः सुशोभनैः।
उन्नतैः स्वेदरहितैः शिराहीनैश्च पार्थिवः।।
तथा च गर्गः—
पद्मरक्तोत्पलनिभैस्तथा क्षतजसन्निभैः।
नृपाः पादतलैर्ज्ञेया ये चान्ये सुखभागिनः।। इति।।२।।
अथात्राैवाशुभलक्षणान्याह—
शूर्पाकारविरूक्षपाण्डुरनखौ वक्रौ शिरासन्ततौ
संशुष्कौ विरलाङ्गुली च चरणौ दारिद्र्यदुःखप्रदौ।
मार्गोयोत्कटकौ कषायसदृशौ वंशस्य विच्छेददौ
ब्रह्मघ्नौ परिपक्वमृद्द्युतितलौ पीतावगम्यारतौ ।।३।।
शूर्पाकार, अस्निग्ध और पाण्डुर नख वाले तथा वक्र नाड़ियों से युत, सूखे और
विरल अंगुलियों वाले पाँव दरिद्रता और दुःख देते हैं। मध्य में उन्नत पाण्डुर वर्ण के
पाँव मार्ग के लिये होते हैं अर्थात् मार्ग में चलाते हैं। कषाय (कृष्ण-लोहित) पाँव
वंश का नाश करते हैं। आग में पकी हुई मिट्टी के समान जिसकी पाँव की कान्ति हो,
वह ब्रह्मघाती होता है। यदि पाँवतल पीले हों तो वह अगम्या स्त्री में रत होता है।।३।।
एवंविधौ चरणौ पादौ। शूर्पाकारावग्रविस्तीर्णौ। विरूक्षावस्निग्धौ। पाण्डुरनखौ
पाण्डुराः शुक्लाभा नखा ययोः। वक्रावस्पष्टौ दीर्घौ वा। शिरासन्ततौ शिराबहुलौ। संशुष्कौ
मांसरहितौ। विरलाङ्गुली च विरला विश्लिष्टा अङ्गुल्यः पादशाखा ययोः, तौ तथाभूतौ,
दारिद्र्यदुःखप्रदौ निर्धनत्वं दुःखं च ददतः। तथा च समुद्रः—
शूर्पाकारास्तथा भग्नैर्वक्रैः शुष्कौः शिराततैः।
सस्वेदैः पाण्डुरै रूक्षैश्चरणैैरतिदुःखिताः।।
मार्गोयोत्कटकाविति । उत्कटकौ मध्यादुन्नतौ पाण्डुराकारौ। मार्गोयाध्वनि रतौ
भवतः, तथा कषायसदृशौ कृष्णलोहितौ। वंशस्य कुलस्य विच्छेददौ विनाशकरौ परिपक्वया
दग्धया मृदा तुल्या द्युतिः कान्तिस्तलयोर्ययोस्तौ ब्रह्मघ्नौ ब्रह्महत्याकरौ। पीतौ पीत-
वर्णावगम्यासु स्त्रीषु रतौ शक्तावित्यर्थः। तथा च समुद्रः—
उत्कटावध्वनि रतौ कषायौ कुलनाशनौ।
ब्रह्मघ्नौ दग्धमृद्वर्णावानिपितावगम्यदौ।। इति।।३।।
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