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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 760 में से

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पृष्ठ 210

अथ छागलक्षणाध्यायः
अथातश्छागलक्षणं व्याख्यायते। तच्चाह—
छागशुभाशुभलक्षणमभिधास्ये नवदशाष्टदन्तास्ते।
धन्याः स्थाप्या वेश्मनि सन्त्याज्याः सप्तदन्ता ये ॥१॥
अब बकरे का शुभाशुभ लक्षण कहते हैं। नव, दश या आठ दाँत वाले छाग शुभ
होते हैं; अतः उनको घर में रखने से शुभ होता है तथा सात दाँत वाले छाग अशुभ होते
हैं; अतः उनका बहिष्कार करना चाहिये॥१॥
छागानामजानां शुभाशुभलक्षणमभिधास्ये कथयिष्ये। ये च छागा नवदशाष्टदन्ता
नवदन्ता दशदन्ता अष्टदन्ता वा ते धन्या शोभनाः, वेश्मनि गृहे स्थाप्याः। ये च सप्त-
दन्ताः सप्तरदास्ते सन्त्याज्याः॥१॥
अन्यदप्याह—
दक्षिणपार्श्वे मण्डलमसितं शुक्लस्य शुभफलं भवति।
ऋष्यनिभकृष्णलोहितवर्णानां श्वेतमतिशुभदम् ॥२॥
जिस छाग के दक्षिण पार्श्व में श्वेत वर्ण का मण्डल हो, ऋष्य ( मृगविशेष ) के
समान कृष्ण-लोहित वर्ण हो या काले अथवा लाल वर्ण के होते हुये भी जिसके दक्षिण
पार्श्व में श्वेत वर्ण का मण्डल हो, वह शुभ होता है॥२॥
शुक्लस्य छागस्य दक्षिणपार्श्वे मध्यभागे असितं कृष्णवर्णं मण्डलाकारं शुभफलं
भवति। ऋष्यनिभस्य नीलवर्णस्य, ऋष्यो मृगजातिः, स च नीलवर्णो भवति। तथा कृष्ण-
वर्णस्य लोहितवर्णस्य श्वेतं मण्डलं दक्षिणपार्श्वेऽतिशुभदं भवति॥२॥
अन्यदप्याह—
स्तनवदवलम्बते यः कण्ठेऽजानां मणिः स विज्ञेयः।
एकमणिः शुभफलकृद्धन्यतमा द्वित्रिमणयो ये ॥३॥
छागों के गले में स्तन की तरह जो लटका रहता है, उसको 'मणि' कहते हैं। एक
मणि वाले शुभ और दो या तीन मणि वाले छाग अत्यन्त शुभ होते हैं॥३॥
कण्ठे गले अजानां छागानाम्, स्तनवत् स्तन इव स्तनो यथा योऽवलम्बते स
मणिर्विज्ञेयो ज्ञातव्यः। एकमणिरेकेन मणिना युक्तो यश्छागः स शुभफलकृच्छुभफलं
करोति। ये द्विमणयस्त्रिमणयो वा ते धन्यतमा प्रशस्ततमा इत्यर्थः॥३॥
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