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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 760 में से

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पृष्ठ 206

अथ कुक्कुटलक्षणाध्यायः
अथ कुक्कुटलक्षणं व्याख्यायते। तत्रादावेव कुक्कुटलक्षणमाह—
कुक्कुटस्त्वृजुतनूरुहाङ्गुलिस्ताम्रावक्त्रनखचूलिकः सितः।
रौति सुस्वरमुषात्यये च यो वृद्धिदः स नृपराष्ट्रवाजिनाम् ॥१॥
जिस मुर्गे के पंख और अंगुलियाँ सीधी हों, ताम्र वर्ण का मुख, नख और चोटी हो,
सफेद वर्ण हो, जो रात्रि के अन्त में अच्छे स्वर से बोलता हो, ऐसा मुर्गा राजा, राज्य
और घोड़ों की वृद्धि करता है॥१॥
यः कुक्कुटः कृकवाकुः। ऋजुतनूरुहाङ्गुलिः, ऋजवः स्पष्टास्तनूरुहाः पक्ष्माणि यस्य;
ऋज्वङ्गुलिः स्पष्टाः करशाखाः। ताम्रवर्णं वक्त्रं मुखं यस्य। ताम्रनखः, ताम्रचूलिकस्ताम्रचूडः।
सितः शुक्लः। उषात्यये रात्र्यवसाने सुस्वरं मधुरं रौति शब्दं करोति। स नृपस्य राज्ञो
राष्ट्रस्य च जनपदस्य वाजिनामश्वानां वृद्धिदो वृद्धिं ददाति। तथा च गर्गः—
श्वेतस्ताम्रनखः शुक्लस्ताम्राक्षस्त्वृजुवालधिः।
अनावृताङ्गुलिः स्वङ्गस्ताम्रचूडः प्रशस्यते॥
अत्यालापी यवग्रीवो दधिवर्णः शुभाननः।
प्रशस्तास्यः स्थूलशिरा हारिद्रचरणो द्विजः॥
अखञ्जस्ताम्रावक्त्राश्च स्निग्धवर्णाश्च पूजिताः।
दीनाश्चैव विवर्णाश्च विस्वराश्च विगर्हिताः॥ इति॥१॥
अथान्यल्लक्षणमाह—
यवग्रीवो यो वा बदरसद्दशो वापि विहगो
बृहन्मूर्धा वर्णैर्भवति बहुभिर्यश्च रुचिरः।
स शस्तः संग्रामे मधुमधुपवर्णश्च जयकृद्
न शस्तो योऽतोऽन्यः कृशतनुरवः खञ्जचरणः ॥२॥
जिस मुर्गे का कण्ठ जौ के समान हो, पके हुये बेर के समान वर्ण हो, बड़ा शिर
हो और सफेद, पीला, लाल, काला आदि अनेक वर्णों से युत हो तो ऐसा मुर्गा युद्ध में
शुभ होता है तथा शहद या भ्रमर के समान वर्ण वाला मुर्गा भी युद्ध में विजय प्राप्त
कराने वाला होता है। इससे भिन्न वर्ण वाला, दुर्बल शरीर वाला, मन्द शब्द करने वाला
और लंगड़ा मुर्गा अशुभ होता है॥२॥
यो विहगः पक्षी यवग्रीवो यवसदृशग्रीवः। यवशिरा इति लोके प्रसिद्धः। यो वा बदर-
सदृशो लोहितवर्णः। सुपक्वबदरफलाभ इत्यर्थः। बृहन्मूर्धा विस्तीर्णशीर्षः। बहुभिर्नानाकारैः
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