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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 760 में से

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पृष्ठ 204

अथ श्वलक्षणाध्यायः
अथ श्वलक्षणं व्याख्यायते। तत्रादावेव शुनो लक्षणमाह—
पादाः पञ्चनखास्त्रयोऽग्रचरणः षड्भिर्नखैर्दक्षिण-
स्ताम्रौष्ठाग्रनसो मृगेश्वरगतिर्जिघ्रन् भुवं याति च।
लाङ्गूलं ससटं दृगृक्षसदृशी कर्णौ च लम्बौ मृदू
यस्य स्यात् स करोति पोष्टुरचिरात्पुष्टां श्रियं श्वा गृहे ॥१॥
जिस कुत्ते के तीन पाँवों में पाँच-पाँच नख और शेष आगे के दाहिने एक पाँव में
छः नख हों, साथ ही नाक के आगे का भाग ताम्र वर्ण का हो, सिंह के समान गति हो,
भूमि को सूंघता हुआ चलता हो, जिसकी पूँछ बहुत बालों से युत हो, भालू के समान
आँखें हों तथा जिसके दोनों कान लम्बे और कोमल हों तो ऐसा कुत्ता अपने स्वामी के
घर में परिपूर्ण लक्ष्मी प्रदान करता है॥१॥
यस्य शुनस्त्रयः पादाश्चरणाः पञ्चनखाः पञ्चभिर्नखैः कररुहैर्युक्ताः। चतुर्थो दक्षिणा-
ऽग्रचरणोऽग्रपादः षड्भिर्नखैर्युक्तः। ताम्रौष्ठाग्रनसः, ताम्रवर्णौ लोहितावोष्ठौ तथा नासिकाग्रं
यस्य। मृगेश्वरः सिंहस्तत्सदृशी गतिर्गमनं यस्य स मृगेश्वरगतिः। भुवं भूमिं जिघ्रन् याति
गच्छति। लाङ्गूलं पुच्छं ससटं सटाभिर्युक्तं जटिलमित्यर्थः। दृग्दृष्टिः ऋक्षसदृशी ऋक्षः
प्राणी तत्सदृशी तत्तुल्या दृष्टिरित्यर्थः। कर्णौ श्रोत्रे। लम्बौ प्रलम्बौ। मृदू मार्दवयुक्तौ।
यस्यैवं स्याद् भवेत् स श्वा कुक्कुरः। पोष्टुः पालयितुः। अचिरात् शीघ्रमेव। गृहे वेश्मनि।
पुष्टां परिपूर्णां। श्रियं लक्ष्मीं करोति। तथा च गर्गः—
त्रयः पादाः पञ्चनखा अग्रगो दक्षिणस्तथा।
षण्णखस्ताम्रनासो यस्ताम्रौष्ठः सिंहविक्रमः।।
महीं जिघ्रन् मुदा याति लाङ्गूलं जटिलं तथा।
ऋक्षाभे चक्षुषी कर्णौ मृदू चातिप्रलम्बितौ।।
स श्वा नृपस्य महतीं श्रियं यच्छति पोषितुः।। इति।।१।।
अथ कुक्कुरीलक्षणमाह—
पादे पादे पञ्च पञ्चाग्रपादे वामे यस्याः षण्नखा मल्लिकाक्ष्याः ।
वक्रं पुच्छं पिङ्गलालम्बकर्णा या सा राष्ट्रं कुक्कुरी पाति पुष्टा ॥२॥
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां श्वलक्षणं
नाम द्वाषष्टितमोऽध्यायः ॥६२॥
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