बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ बृहत्संहिता
मुख्य ब्राह्मणों के द्वारा पूर्व दिशा में इन्द्र के और अग्नि कोण में अग्नि के मन्त्र का
जप कराना चाहिये। तत्पश्चात् यजमान द्वारा उन ब्राह्मणों की दक्षिणा आदि से पूजा की
जानी चाहिये॥११॥
ऐन्द्रयां पूर्वस्यां दिशीन्द्रलिङ्गा मन्त्रा इन्द्रदैवत्या ऐन्द्रा मन्त्रा द्विजमुख्यैर्ब्राह्मणश्रेष्ठैर्वक्तव्याः
पाठनीयाः। केचित् 'जप्तव्याः' इति पठन्ति। तथा प्राग्दक्षिणे आग्नेय्यां दिशि। अग्निलिङ्गा
अग्निदैवत्या मन्त्रा वक्तव्याः। ते च द्विजमुख्या दक्षिणाभिः पूज्या अर्च्याः॥११॥
ततः किं कुर्यादित्याह—
यो देवः संस्थाप्यस्तन्मन्त्रैश्चानलं द्विजो जुहुयात्।
अग्निनिमित्तानि मया प्रोक्तानीन्द्रध्वजोत्थाने ॥१२॥
धूमाकुलोऽपसव्यो मुहुर्मुहुर्विस्फुलिङ्गकृन्न शुभः।
होतुः स्मृतिलोपो वा प्रसर्पणं चाशुभं प्रोक्तम् ॥१३॥
जिस देवता की प्रतिष्ठा हो रही हो, उस देवता के मन्त्रों से ब्राह्मण के द्वारा हवन
कराना चाहिये। इन्द्रध्वजाध्याय में अग्नि के शुभाशुभ लक्षण हमारे द्वारा कहे गये हैं।
यदि हवन के समय अग्नि धूमयुत हो, उसकी ज्वाला वामावर्त क्रम से घूमती हो, बार-
बार शब्द करती हो या उसमें चिनगारी उड़ती हो तो शुभ नहीं होता है तथा यदि हवन
करने वाले की स्मृति का उस समय लोप हो जाय या प्रसर्पण हो जाय ( जहाँ पहले
बैठा हो, वहाँ से सरक जाय ) तो भी शुभ नहीं होता है॥१२-१३॥
यो देवः संस्थाप्यः प्रतिष्ठापनीयः, तन्मन्त्रैस्तद्दैवत्यैर्वैदिकैर्मन्त्रैर्द्विजो ब्राह्मणोऽनलमग्निं
जुहुयात्। मया अग्निनिमित्तानि अग्निलक्षणानि इन्द्रध्वजोत्थाने उक्तानि कथितानि। 'स्वाहाव-
सानसमये स्वयमुज्ज्वलार्चिः' इत्यादि। अग्निर्धूमाकुलो धूमेनाकुलीकृतः सधूमः। अपसव्यो
वामावर्तः। मुहुर्मुहुः, मुहुर्मुहुरिति शब्दं करोति। विस्फुलिङ्गकृद्विस्फुलिङ्गं करोति मुञ्चति,
तथाविधो न शुभः। अथवा होतुः पुरोहितस्य स्मृतिलोपो विस्मृतिर्भवति, प्रसर्पणं च पश्चाद्
गमनमशुभमनिष्टं प्रोक्तं कथितम्॥१३॥
ततः किं कुर्यादित्याह—
स्नातामभुक्तवस्त्रां स्वलङ्कृतां पूजितां कुसुमगन्धैः।
प्रतिमां स्वास्तीर्णायां शय्यायां स्थापकः कुर्यात् ॥१४॥
प्रतिष्ठा करने वाला पुरुष द्वारा स्नान कराई हुई, वस्त्र पहनाई हुई, भूषण पहनाई
हुई, पुष्प और सुगन्धित द्रव्यों से पूजा की हुई प्रतिमा को सुन्दर बिछी हुई शय्या पर
स्थापित करना चाहिये॥१४॥
तां प्रतिमां स्नातां कृतस्नानाम्। अभुक्तवस्त्रामभिनववस्त्रप्रावृताम्। स्वलङ्कृतां शोभनैर्-
लङ्करणैरलंकृताम्। कुसुमैः पुष्पैः। गन्धैः सुगन्धद्रव्यैरगुरुप्रभृतिभिश्च पूजितामर्चिताम्। स्थापकः
प्रतिष्ठापकः। स्वास्तीर्णायां शोभनास्तृतायां शय्यायां कुर्यात् स्थापयेदित्यर्थः॥१४॥
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