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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 760 में से

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पृष्ठ 190

१६२ बृहत्संहिता
लकड़ी और मिट्टी की प्रतिमा आयु, श्री, बल और विजय प्रदान करती है। मणि
की प्रतिमा लोगों के हित के लिये होती है। सोने की प्रतिमा पुष्टि देती है। चाँदी की प्रतिमा
यश प्रदान करती है। ताम्बे की प्रतिमा सन्तान की वृद्धि करती है। पत्थर की प्रतिमा या
शिवलिङ्ग अत्यधिक भूमि का लाभ कराते हैं॥४-५॥
प्रतिमा दारुमयी काष्ठनिर्मिता तथा मृण्मयी पार्थिवी आयुर्जीवितम्, श्रियं लक्ष्मीम्,
बलं वीर्यम्, जयं विजयं च ददाति। मणिमयी रत्ननिर्मिता प्रतिमा लोकानां जनानां हिताय
भवति। सौवर्णी काञ्चननिर्मिता पुष्टिदा शरीरपुष्टिं ददाति।
रजतमयी रौप्यनिर्मिता कीर्तिं यशः करोति। ताम्रमयी प्रजानां पुत्रादीनां विवृद्धिं करोति।
शैली शिलामयी प्रतिमार्चाऽथवा लिङ्गं शैलं शिलामयं महान्तमतिप्रभूतं भूलाभं करोति।
तथा च काश्यपः—
यार्चा मृद्दारुसम्भूता सायुःश्रीबलदा मता।
सौवर्णी पुष्टिदा ज्ञेया रत्नजा हितकारिणी।।
राजती कीर्तिदा ज्ञेया ताम्रजा जनवर्धिनी।
महत् करोति भूलाभं यार्चा पाषाणनिर्मिता।। इति॥४-५॥
पुनरपि विशेषमाह—
शङ्कूपहता प्रतिमा प्रधानपुरुषं कुलं च घातयति।
श्वभ्रोपहता रोगानुपद्रवांश्च क्षयं कुरुते ॥६॥
किसी प्रकार की कील से पीड़ित प्रतिमा प्रधान पुरुष और सन्तान का नाश करती
है तथा किसी प्रकार के गड्ढे से युत प्रतिमा रोग, उपद्रव और मृत्यु को करती है॥६॥
शङ्कुस्तिर्यग् निर्गतः कीलकः। अङ्ग इति प्रसिद्धो लोके। तेनोपहता प्रतिमार्चा प्रधान-
पुरुषं नायकं कुलं वंशं च घातयति; श्वभ्रं गर्तस्तेनोपहता प्रतिमा रोगान् गदानुपद्रवान्
दोषान् क्षयं च करोति। तथा च काश्यपः—
यार्चा शङ्कुहता सा तु प्रधानकुलनाशिनी।
छिद्रेणोपहता या तु बहुदोषकरी मता।। इति॥६॥
अथाधिवासनलक्षणमाह—
मण्डपमध्ये स्थण्डिलमुपलिप्यास्तीर्य सिकतयाथ कुशैः।
भद्रासनकृतशीर्षोपधानपादां न्यसेत् प्रतिमाम् ॥७॥
अधिवासन मण्डप के मध्य में बनाये हुये स्थण्डिल को लीप कर उस पर रेत और
रेत के ऊपर कुशा बिछा कर उसके ऊपर प्रतिमा को सुला देना चाहिये। प्रतिमा का शिर
राजा के आसन पर और पाँव को तकिये पर रखना चाहिये॥७॥
अधिवासनमण्डपस्य मध्येऽन्तः स्थण्डिलं भूभागमुपलिप्य ततः सिकतया बालुकया
कुशैर्दर्भैश्चास्तीर्य। अथशब्दोऽत्र चार्थे। आस्तरणमाच्छादनं बालुकां प्रसार्य तदुपरि दर्भैराच्छादनं
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