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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 178, कुल 760 में से

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पृष्ठ 178

इन्द्र के हाथी ( ऐरावत ) की प्रतिमा सफेद और चार दाँतों से युत बनानी चाहिये
तथा इन्द्र की प्रतिमा के हाथ में वज्र धारण कराना चाहिये और ललाट के मध्य में
तिरछा तीसरा नेत्र बनाना चाहिये ।।४२।।
महेन्द्रस्य द्विपो हस्ती ऐरावताख्यः शुक्लः श्वेतवर्णः। चतुर्विषाणश्चतुर्दन्तः स च
कार्यः। वज्रपाणित्वं वज्रमायुधविशेषः कुलिशाख्यः स पाणौ यस्य स वज्रपाणिस्तस्य
भावो वज्रपाणित्वम्। तृतीयं लोचनं नेत्रं तिर्यग् ललाटसंस्थं तिर्यक् कृत्वा ललाटे स्थितं
चिह्नमपि कार्यम् ।।४२।।
अथ भगवतो महेश्वरस्य लक्षणमाह—
शम्भोः शिरसीन्दुकला वृषध्वजोऽक्षि च तृतीयमपि चोर्ध्वम्।
शूलं धनुः पिनाकं वामार्धे वा गिरिसुतार्धम् ।।४३।।
शिव जी की प्रतिमा के मस्तक पर चन्द्रकला बनानी चाहिये, उनकी ध्वजा में वृष
का चिह्न बनाना चाहिये। उनके ललाट में खड़ा तीसरा नेत्र बनाना चाहिये। उनके एक
हाथ में त्रिशूल और दूसरे में पिनाक नामक धनुष धारण कराना चाहिये अथवा उनकी
बाईं तरफ आधे भाग में पार्वती की प्रतिमा बनानी चाहिये ।।४३।।
शम्भोर्महेश्वरस्य शिरसि मूर्धनि कला चन्द्रकला कार्या। वृषध्वजः वृषो दान्तः स
एव ध्वजः चिह्नं यस्य। ऊर्ध्वमूर्ध्वस्थितं तृतीयमपि अक्षि नेत्रं कार्यम्। शूलं त्रिशूलमेकस्मिन्
हस्ते। धनुः चापं तदेव पिनाकसंज्ञमन्यस्मिन्। गिरिसुता गौरी वामेऽर्धे वा कार्या। अर्ध-
गौरीश्वर इत्यर्थः ।।४३।।
अथ बुद्धस्य लक्षणमाह—
पद्माङ्कितकरचरणः प्रसन्नमूर्तिः सुनीचकेशश्च।
पद्मासनोपविष्टः पितेव जगतो भवति बुद्धः ।।४४।।
बुद्ध की प्रतिमा के हाथ एवं पाँव में कमल का चिह्न, प्रसन्नमुख, बहुत छोटे-छोटे
शिर के बालों से युत, पद्मासन से बैठी हुई और संसार के पिता के समान दिखाई देने
वाली बनानी चाहिये ।।४४।।
बुद्धः पद्माङ्कितकरचरणः कार्यः। करौ हस्तौ चरणौ पादौ पद्मेन कमलेनाङ्कितौ
चिह्नितौ कृताभी रेखाभिरित्यर्थः। प्रसन्नमूर्तिः सौम्यदेहः प्रसादपरः। सुनीचकेशश्च सुनीचा
अत्यल्पाः केशा मूर्धजा यस्य। केचित् सुनीतकेशश्चेति पठन्ति। सुनीता अतिनियमिताः।
पद्मासने कमलासने उपविष्टः स्थितः। पितेव जगतः, जगतो विश्वस्य पितेव जनक इति।
क्षान्तिशील इत्यर्थः ।।४४।।
अथार्हतां देवस्य लक्षणमाह—
आजानुलम्बबाहुः श्रीवत्साङ्कः प्रशान्तमूर्तिश्च।
दिग्वासास्तरुणो रूपवांश्च कार्योऽर्हतां देवः ।।४५।।