बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८ बृहत्संहिता
शान्तिदः करः। वामकरेषु वामहस्तेषु च कार्मुकं धनुः शार्ङ्गम्। खेटकं फरः। चक्रं सुदर्शनम्।
शङ्खश्च पाञ्चजन्यः।
अथशब्दो विकल्पे। तुशब्दो विशेषद्योतकः। यदि चतुर्भुजं कर्तुमिच्छति तदा दक्षिण-
पार्श्वे भुजद्वये एकः शान्तिदः करः। द्वितीयो गदाधरः। वामपार्श्वे भुजद्वये एकस्मिन् शङ्खो
द्वितीये चक्रम्।
द्विभुजस्य विष्णोर्दक्षिणहस्तः शान्तिदः। अपरो वामः शङ्खधरः। एवमनेन प्रकारेण
भूतिमिच्छद्भिः समृद्धिमभिलषद्भिर्विष्णोर्नारायणस्य प्रतिमाऽर्चा कार्या।।३१-३५।।
अथ हलधरस्य लक्षणमाह—
बलदेवो हलपाणिर्मदविभ्रमलोचनश्च कर्तव्यः।
बिभ्रत् कुण्डलमेकं शङ्खेन्दुमृणालगौरतनुः ॥३६॥
बलदेव की प्रतिमा के एक हाथ में हल धारण कराना चाहिये। मद से चलायमान
नेत्र बनाना चाहिये। उसके एक कान में कुण्डल धारण कराना चाहिये तथा प्रतिमा को
शंख, चन्द्र या मृणाल के समान सफेद वर्ण वाला बनाना चाहिये।।३६।।
बलदेवो हलधरो हलपाणिर्लाङ्गलहस्तः। मदविभ्रमलोचनो मदिरापानेन यो मदस्तेन
विभ्रमे चलिते लोचने नयने यस्य स तथाभूतः कर्तव्यः। एवं कुण्डलं कर्णाभरणं बिभ्रद्
धारयन्। शङ्खेन्दुमृणालगौरतनुः, शङ्खः प्रसिद्धः, इन्दुश्चन्द्रः। मृणालो बिसम्, तद्वद्गौरी
श्वेता तनुर्यस्य स तथाभूतः।।३६।।
अथैकानंशाया लक्षणमाह—
एकानंशा कार्या देवी बलदेवकृष्णयोर्मध्ये।
कटिसंस्थितवामकरा सरोजमितरेण चोद्वहती ॥३७॥
कार्या चतुर्भुजा या वामकराभ्यां सपुस्तकं कमलम्।
द्वाभ्यां दक्षिणपार्श्वे वरमर्थिष्वक्षसूत्रं च ॥३८॥
वामेऽथाष्टभुजायाः कमण्डलुश्चापमम्बुजं शास्त्रम्।
वरशरदर्पणयुक्ताः सव्यभुजाः साक्षसूत्राश्च ॥३९॥
बलदेव और कृष्ण की प्रतिमा के मध्य में 'एकानंशा' नाम की देवी की प्रतिमा
बनानी चाहिये। उसका बाँया हाथ उसके कमर पर रखना चाहिये और दाहिने हाथ में
कमल धारण कराना चाहिये। चतुर्भुजा एकानंशा देवी के बाईं तरफ एक हाथ में पुस्तक
और दूसरे में कमल तथा दाईं तरफ एक हाथ में वर देने वाली मुद्रा और दूसरे में माला
धारण कराना चाहिये। अष्टभुजा एकानंशा देवी की मूर्ति के बायें चार हाथों में क्रम से
कमण्डलु, धनुष, कमल और पुस्तक तथा दाहिने चार हाथों में क्रम से वर देने वाली
मुद्रा, बाण, दर्पण और अक्षसूत्र धारण कराना चाहिये।।३७-३९।।
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