बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रतिमालक्षणाध्यायः १४७
अधुना भगवतो विष्णोः स्वरूपकथनमाह—
कार्योऽष्टभुजो भगवांश्चतुर्भुजो द्विभुज एव वा विष्णुः।
श्रीवत्साङ्कितवक्षाः कौस्तुभमणिभूषितोरस्कः॥३१॥
अतसीकुसुमश्यामः पीताम्बरनिवसनः प्रसन्नमुखः।
कुण्डलकिरीटधारी पीनगलोरःस्थलांसभुजः॥३२॥
खड्गगदाशरपाणिर्दक्षिणतः शान्तिदश्चतुर्थकरः।
वामकरेषु च कार्मुकखेटकचक्राणि शङ्खश्च॥३३॥
अथ च चतुर्भुजमिच्छति शान्तिद एको गदाधरश्चान्यः।
दक्षिणपार्श्वे त्वेवं वामे शङ्खश्च चक्रं च॥३४॥
द्विभुजस्य तु शान्तिकरो दक्षिणहस्तोऽपरश्च शङ्खधरः।
एवं विष्णोः प्रतिमा कर्तव्या भूतिमिच्छद्भिः॥३५॥
विष्णु की प्रतिमा अष्टभुज, चतुर्भुज या द्विभुज बनानी चाहिये। उनके वक्षःस्थल
को श्रीवत्सचिह्न और कौस्तुभ मणि से शोभित करना चाहिये। अतसी-पुष्प के समान
श्याम वर्ण, पीताम्बर पहनी हुई, प्रसन्न मुख, पुष्ट कण्ठ, वक्षःस्थल, कन्धा और भुजा
वाली, दाहिने तीन हाथों में खड्ग, गदा और शर धारण की हुई, चौथा हाथ अभय मुद्रा
से युत, बाईं तरफ के चार हाथों से धनुष, ढाल, चक्र और शंख धारण की हुई अष्टभुज
विष्णु की प्रतिमा बनानी चाहिये।
चतुर्भुज विष्णु की प्रतिमा बनानी हो तो दाहिने तरफ के एक हाथ में अभय
मुद्रायुत, दूसरे में गदा धारण की हुई, बाईं तरफ के एक हाथ में शंख और दूसरे में चक्र
धारण की हुई मूर्ति बनानी चाहिये।
द्विभुज प्रतिमा बनानी हो तो दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और बाँये में शंख धारण
की हुई मूर्ति बनानी चाहिये। ऐश्वर्य को चाहने वाले मनुष्य को इसी तरह विष्णु की
प्रतिमा बनानी चाहिये॥३१-३५॥
कार्योऽष्टभुजो भगवानिति। भगवान् विष्णुनारायणोऽष्टभुजोऽष्टहस्तः कार्यः,
चतुर्भुजो द्विभुज एव वा कार्यः। श्रीवत्साङ्कितवक्षाः। श्रीवत्सेन रोमावर्तेनाङ्कितं चिह्नितं
वक्ष उरो यस्य, तथा कौस्तुभाख्येन मणिना भूषितमलङ्कृतमुरो वक्षो यस्य।
अतसीकुसुमवदतसीपुष्पवत् श्यामः। पीतान्यम्बराणि वसनं परिधानं यस्य। प्रसन्नमुखः
सौम्यवदनः। कुण्डलं कर्णाभरणं किरीटं मुकुटं तद्धारणं शीलमस्य। पीनः पीवरो गलः
कण्ठो यस्य। मांसल इत्यर्थः। तथा पीनोरःस्थलः। पीनांसः पीनस्कन्धः। पीनभुजः पीनबाहुः।
दक्षिणतो दक्षिणभागे अष्टभुजस्य ये चत्वारः पाणयो हस्तास्तेष्वेकस्मिन् खड्गो
नन्दकः। द्वितीये गदा कौमोदकी। तृतीये शरः। चतुर्थे शान्तिदः। द्रष्टुरभिमुख ऊर्ध्वाङ्गुलिः
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