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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 167

प्रतिमालक्षणाध्यायः १३९
माथे की चौड़ाई आठ अंगुल, दोनों तरफ कनपटी की चौड़ाई दो-दो अंगुल और
लम्बाई चार-चार अंगुल तथा दोनों कानों की चौड़ाई दो-दो अंगुल बनानी चाहिये ।।६।।
ललाटं विस्तारादष्टाङ्गुलं कार्यम्, तस्मात् परे भागे उभयतो द्वयङ्गुलप्रमाणौ शङ्खौ कार्यौ,
ललाटात् परतः कार्यावित्यर्थः । शङ्खौ चतुरङ्गुलावधोभागौ दीर्घौ कार्यौ, यतः शङ्खाधो
गण्डभाग उच्यते। कर्णौ तु द्वयङ्गुलौ पृथुलौ विस्तीर्णौ कार्यौ ।।६।।
अन्यदप्याह—
कर्णोपान्तः कार्योऽर्धपञ्चमे भ्रूसमेन सूत्रेण ।
कर्णस्रोतः सुकुमारकं च नेत्रप्रबन्धसमम् ॥७॥
नेत्र के प्रान्तभाग से भ्रू के समानान्तर सूत्र में साढे चार अंगुल पर कान का अग्रभाग
बनाना चाहिये तथा कान के छेद और सुकुमारक (कान के छेद के समीप का उन्नत
मार्ग) को नेत्र-प्रबन्ध (प्रदूषिका) के समान बनाना चाहिये ।।७।।
अर्द्धपञ्चमे अर्धपञ्चममङ्गुलं यस्मिन् भागे। सार्धानि चत्वार्यङ्गुलानि नेत्रान्तादारभ्य
तस्मिन् भ्रूसमेन सूत्रेण नेत्रमध्यगेन कर्णोपान्तः कार्यः। कर्णस्योपान्तः समीपः, कर्णाग्रमित्यर्थः।
कर्णस्रोतः कर्णाच्छिद्रं सुकुमारकं च कर्णस्रोतःसमीपे उन्नतो मार्गस्तन्नेत्रप्रबन्धसमम्। नेत्र-
प्रबन्धशब्देन प्रदूषिकोच्यते। तत्समं तत्तुल्यं कार्यम्। अङ्गुलप्रमाणमित्यर्थः।।७।।
अन्यदप्याह—
चतुरङ्गुलं वसिष्ठः कथयति नेत्रान्तकर्णयोर्विवरम् ।
अधरोऽङ्गुलप्रमाणस्तस्यार्धेनोत्तरोष्ठश्च ॥८॥
वसिष्ठ मुनि कहते हैं कि आँख और कान का अन्तर चार अंगुल, नीचे का ओंठ
एक अंगुल और ऊपर का आधा अंगुल बनाना चाहिये ।।८।।
वसिष्ठमुनिर्नेत्रान्तकर्णयोर्विवरमन्तरं चतुरङ्गुलं कथयति। तथा च वसिष्ठः—
कर्णनेत्रान्तरं यच्च तद्विन्द्यात् चतुरङ्गुलम्।
अधरोष्ठोऽङ्गुलप्रमाणेण विस्तीर्णः कार्यः, उत्तरोष्ठश्च तस्यार्धेनाधरोष्ठस्यार्धेनार्धाङ्गुल-
विस्तीर्णः कार्यः।।८।।
अन्यदप्याह—
अर्धाङ्गुला तु गोच्छा वक्तं चतुरङ्गुलायतं कार्यम् ।
विपुलं तु सार्धमङ्गलमव्यात्तं त्र्यङ्गुलं व्यात्तम् ॥९॥
आधा अंगुल विस्तार गोच्छा और चार अंगुल दैर्घ्य मुख बनाना चाहिये। साथ ही
डेढ़ अंगुल विस्तार अव्यात्त (अविस्तृत) मुख और तीन अंगुल विस्तार व्यात्त (नृसिंह
आदि देवताओं का विस्तृत) मुख बनाना चाहिये ।।९।।
बृ० भ० द्वि०-९
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