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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 165, कुल 760 में से

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पृष्ठ 165

अथ प्रतिमालक्षणाध्यायः
अथ प्रतिमालक्षणं व्याख्यायते। तत्रादावेव परमाणुप्रमाणार्थमाह—
जालान्तरगे भानौ यदणुतरं दर्शनं रजो याति।
तद्विन्द्यात् परमाणुं प्रथमं तद्धि प्रमाणानाम् ॥१॥
जालान्तरगत सूर्यकिरण में जो धूलि दिखाई देती है, उसको 'परमाणु' जानना चाहिये।
यह सब प्रमाणों में पहला प्रमाण होता है॥१॥
भानावादित्ये जालान्तरगे गवाक्षस्थलकमध्यवर्तिनि यद्रजो धूलिरणुतरं सूक्ष्मतरं
दर्शनं याति दृष्टिपथमायाति तत् परमाणुं नाम प्रमाणं विन्द्याज्जानीयात्। हिर्यस्मादर्थे।
प्रमाणानां सर्वेषां तत्प्रथममाद्यं प्रमाणं परमाणुसंज्ञम्॥१॥
अथ परमाणौ ज्ञातेऽङ्गुलप्रमाणज्ञानमाह—
परमाणुरजो बालाग्रलिक्षयूकं यवोऽङ्गुलं चेति।
अष्टगुणानि यथोत्तरमङ्गुलमेकं भवति संख्या ॥२॥
आठ परमाणु का रज, आठ रज का बालाग्र, आठ बालाग्र की लिक्षा, आठ लिक्षा
का यूक, आठ यूक का यव और आठ यव का एक अंगुल होता है तथा एक अंगुल की
संख्या होती है॥२॥
एतानि परमाण्वादीनि यथोत्तरमष्टगुणान्यङ्गुलमेकं भवति। तद्यथा—अष्टभिः परमाणुभी
रजो भवति। अष्टभी रजोभिर्बालाग्रम्, अष्टभिर्बालाग्रैर्लिक्षा, अष्टभिर्लिक्षाभिर्यूका, अष्टभि-
र्यूकाभिर्यवः, अष्टभिर्यवैरङ्गुलम्। एवं यथोत्तरं परमाण्वादीन्यष्टगुणान्यङ्गुलं संख्या भवति।
तथा च—
जालान्तरगते भानौ यत् सूक्ष्मं दृश्यते रजः।
प्रथमं तत्प्रमाणानां परमाणुं प्रचक्षते॥
तस्माद्रजः कचाग्रं च लिक्षा यूका यवोऽङ्गुलम्।
क्रमादष्टगुणं ज्ञेयं जिनसंख्याङ्गुलैः करः॥ इति॥२॥
अथ समस्तायाः प्रतिमायाः प्रमाणमाह—
देवागारद्वारस्याष्टांशोनस्य यस्तृतीयोंऽशः।
तत्पिण्डिकाप्रमाणं प्रतिमा तद्द्विगुणपरिमाणा ॥३॥
देवालय के द्वार की अष्टमांशोन ऊँचाई की तिहाई, तुल्य पिण्डिका ( पीठिका )
और द्विगुणित पीठिकातुल्य प्रतिमा होती है॥३॥
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