बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रासादलक्षणाध्यायः १२५
देवालय का जितना विस्तार हो, उससे दूनी ऊँचाई और ऊँचाई की तिहाई कटि
होती है। सीढ़ी के ऊपर जहाँ से देवालय का प्रारम्भ होता है उसको 'कटि' कहते हैं।
विस्तार के आधा गर्भ शेष सब दिशाओं में भीत बनती है। गर्भ के चौथाई के समान द्वार
का विस्तार और द्विगुणित विस्तारतुल्य द्वार की ऊँचाई होती है। द्वार की ऊँचाई तुल्य
शाखा ( चौखट का बाजू ) और उदुम्बर ( चौखट के ऊपर की लकड़ी ) की चौड़ाई
होती है तथा शाखा की चौथाई की चौथाई के तुल्य शाखाओं की मोटाई होती है।
शाखाओं की चौड़ाई के बीच में तीन, पाँच, सात या नव शाखायें होने से द्वार श्रेष्ठ होता
है। दोनों शाखाओं के नीचे की चौथाई में दो प्रतिहार ( नन्दी, दण्ड आदि ) की मूर्ति
खुदवानी चाहिये। शाखाओं के तीन-चौथाई भागों को हंस आदि शुभ पक्षी, बेल, स्वस्तिक
( चिह्नविशेष ), कलश, स्त्री-पुरुष का जोड़ा, पत्ते और लताओं से शोभित करना चाहिये।
द्वार की ऊँचाई में उसका अष्टमांश घटा कर जो शेष बचे, उतनी पिण्डका ( देवतास्थापन
की पीठिका ) को लेकर देवप्रतिमा की ऊँचाई होती है। पीठिकासहित प्रतिमा की
ऊँचाई का तीन भाग करके दो भाग के बराबर ऊँची प्रतिमा और एक भाग के समान
पीठिका बनानी चाहिये। यह प्रमाण समस्त प्रासादों में जानना चाहिये।।११-१६।।
यो विस्तार इति। तस्य देवगृहस्य यो विस्तारो विष्कम्भो भवेत् स्यात् तद्द्विगुणा
विस्ताराद् द्विगुणा समुन्नतिरुच्छ्रायो भवति। यथा मेरुप्रासादस्य द्वात्रिंशद्विस्तारः। विस्ताराद्
द्विगुणा समुन्नतिश्चतुःषष्टिर्हस्ताः। उच्छ्रायाद् यस्तृतीयांशस्तृतीयभागस्तेन च तुल्या तत्समा
देवगृहस्य कटिः स्मृतोक्ता। यथा मेरोश्चतुःषष्टिर्हस्ता उच्छ्रायः। तस्मात् त्रिभाग एकविंशतिर्हस्ता
अष्टावङ्गुलानि। अनेन प्रमाणेन कटिर्भवति। सोपानोपरि यतो देवगृहस्य प्रारम्भः सा कटि-
रुच्यते।
विस्तारार्धमिति। देवगृहस्य यो विस्तार उक्तस्तदर्थं गर्भो भवति। यथा मेरोर्हस्ताद्
द्वात्रिंशद्विस्तारः। तदर्थं षोडश। अनेन प्रमाणेन मेरोगर्भः। अन्याः समन्ततः सर्वासु दिक्षु
विदिक्षु भित्तयो भवन्ति। हस्तमात्रं भ्रमणाय सर्वासु दिक्ष्वनावृतं स्थापयित्वा शेषं हस्तत्रयं
भित्त्यवष्टब्धं कुर्यात्। गर्भस्य यः पादश्चतुर्थांशस्तेन मानेन विस्तीर्णं द्वारं भवति। यथा
मेरोगर्भः षोडशहस्ताः। तस्य चतुर्थागश्चत्वारो हस्ताः। एष द्वारस्य विस्तारः। विस्ताराद्
द्विगुणमुच्छ्रितं कार्यम्। एवमष्टौ हस्ता मेरुद्वारोच्छ्रायः कार्यः।
उच्छ्रायादिति। द्वारस्य य उच्छ्रायस्तस्य यः पादश्चतुर्भागस्तेन मानेन विस्तीर्णा
शाखा द्वारिका कार्या। यथा मेरुद्वारस्योच्छ्रायोऽष्टौ हस्ताः। अस्य चतुर्थागो द्वौ हस्तौ।
एष शाखाया विस्तारः। तद्वदुदुम्बरस्तद्वत् तेनैव प्रकारेणोदुम्बरः कार्यः। शाखयोरुपरि
यत् काष्ठं दीयते यच्चाधः स उदुम्बर इत्युच्यते। तद्वदुदुम्बराविति केचित् पठन्ति। विस्तार-
पादप्रतिममिति। शाखाया यो विस्तारस्तस्य यः पादश्चतुर्भागस्तत्प्रतिमं तत्तुल्यं शाखायो-
र्बाहुल्यं घनत्वं स्मृतमुक्तम्। यथा मेरुद्वारशाखाविस्तारो द्वौ हस्तौ। विस्तारपादो द्वादशाङ्गुलानि।
एतद् घनत्वम्।
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