बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदकार्गलाध्यायः १०९
हस्त, मघा, अनुराधा, पुष्य, धनिष्ठा, तीनों उत्तरा, रोहिणी, शतभिषा—इन नक्षत्रों
में कूप का आरम्भ करना शुभ होता है।।१२३।।
हस्तः, मघा, अनुराधा, पुष्यः, धनिष्ठा, उत्तरास्तिस्र उत्तरफल्गुन्युत्तराषाढोत्तरभद्रपदा
चेति एतानि, तथा रोहिण्यः, शतभिषक्शब्दो व्यवच्छेदाय। अयं भगणे नक्षत्रसमूहः कूपा-
नामारम्भे शस्यते इष्यते।।१२३।।
अधुना प्रतिष्ठाविधानमाह—
कृत्वा वरुणस्य बलिं वटवेतसकीलकं शिरास्थाने ।
कुसुमैर्गन्धैर्धूपैः सम्पूज्य निधापयेत् प्रथमम् ।।१२४।।
इति श्रीवराहमिहिरकृतौ बृहत्संहितायां दकार्गलं
नाम चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।।५४।।
वरुण को बलि देकर गन्ध, पुष्प, धूप आदि से बड़ या वेतस की लकड़ी की
कील की पूजन करके पहले शिरास्थान में उसको स्थापित करना चाहिये।।१२४।।
वरुणस्यापाम्पतेर्बलिमुपहारं कृत्वा विधाय वटवेतसकीलकं वटकीलकं वेतसकीलकं
च कुसुमैः पुष्पैर्गन्धैर्गन्धद्रव्यैर्धूपैर्गुग्गुलप्रभृतिभिः सम्पूज्याभ्यर्च्य प्रथममादौ शिरास्थाने
शिराप्रदेशे विनिधापयेद् निखनेत् स्थिरं स्थापयेदिति ।।१२४।।
इति श्रीभट्टोत्पलविरचितायां संहिताविवृतौ दकार्गलं
नाम चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।।५४।।
( मेघोद्भवं प्रथममेव मया प्रदिष्टं
ज्येष्ठामतीत्य बलदेवमतादि दृष्ट्वा ।
भौमं दकार्गलमिदं कथितं द्वितीयं
सम्यग्वराहमिहिरेण मुनिप्रसादात् ।।
ज्येष्ठ की पूर्णिमा के बाद में जिस प्रकार जल का ज्ञान होता है, उसको मैंने पहले
ही कह दिया है। यहाँ बलदेव आदि आचार्यों का मत देखकर मुनियों की कृपा से मैंने
जलज्ञान के लिये यह दूसरा 'दकार्गल' नामक अध्याय कहा है।)
इति 'विमला' हिन्दीटीकायां दकार्गलाध्यायश्चतुष्पञ्चाशत्तमः ।।५४।।
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