बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६ बृहत्संहिता
अन्यदप्याह—
नैम्बं पत्रं त्वक्च नालं तिलानां
सापामार्गं तिन्दुकं स्याद् गुडूची।
गोमूत्रेण स्रावितः क्षार एषां
षट्कृत्वोऽस्ततापितो भिद्यतेऽश्मा ॥११५॥
नीम के पत्ते, नीम की छाल, तिलों का नाल, अपामार्ग, तेन्दू का फल, गिलोय—
इन सबों के भस्म को गोमूत्र में मिलाकर उसे तपाई हुई शिला पर छः बार छिड़कने से
शिला फूट जाती है॥११५॥
नैम्बमिति। पत्रं त्वक् च नैम्बमेव। तिलानां नालं यस्मिन्नभ्यन्तरे कोशाकारे तिला
भवन्ति। सापामार्गमपामार्गसहितं तिन्दुकफलं स्याद् भवेत्। गुडूची अमृता। एषामेकीकृतानां
क्षारो भस्म गोमूत्रेण स्रावितः परिस्रावितः। तेनाश्मा पाषाणस्तापितः प्राग्विधिना षट्कृत्वः
षड्वारं परिषेचनं कृत्वा भिद्यते॥११५॥
अधुना शस्त्रपानमाह—
आर्कं पयो हुडुविषाणमषीसमेतं
पारावताखुशकृता च युतः प्रलेपः।
टङ्कस्य तैलमथितस्य ततोऽस्य पानं
पश्चाच्छितस्य न शिलासु भवेद्विघातः ॥११६॥
शस्त्र पर पहले तिल का तेल मले, फिर मेष के सींग का भस्म तथा कबूतर और
चूहे की बीट से युत आक के वृक्ष के दूध का लेप करे, फिर उसको आग में तपा कर
पूर्वोक्त पान देवे। ऐसा करने के पश्चात् तेज करके पत्थर पर प्रहार करने से भी उसकी
धार नहीं टूटती है॥ ११६॥
टङ्कं शस्त्रम्। एष श्लोकः खड्गलक्षणे व्याख्यातः॥११६॥
अन्यदप्याह—
क्षारे कदल्या मथितेन युक्ते
दिनोषिते पायितमायसं यत्।
सम्यक् शितं चाश्मनि नैति भङ्गं
न चान्यलोहेष्वपि तस्य कौण्ठ्यम् ॥११७॥
एक अहोरात्र तक तक्र से युत कदली वृक्ष की भस्म में स्थापित लोहे में पूर्वोक्त
पान देकर तीक्ष्ण करके पत्थर पर प्रहार करने से भी उस शस्त्र की धार नहीं टूटती है
तथा अन्य लोहे पर प्रहार करने से भी वह शस्त्र कुण्ठता (अतीक्ष्णता) को नहीं प्राप्त
होता है॥११७॥
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