बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदकार्गलाध्यायः १०३
जहाँ सूर्य, अग्नि, भस्म, ऊँट या गदहे के रंग की या लाल रंग की भूमि में लाल
अंकुर वाला, दूध वाला करीर वृक्ष हो या लाल वर्ण की भूमि हो, वहाँ पत्थर के नीचे
जल होता है।।१०६।।
या वसुधा भूः सूर्यस्यादित्यस्याग्नेर्वह्नेर्भस्मन उष्ट्रस्य करभस्य खरस्य गर्दभस्य एषा-
मनुवर्णा सदृशप्रभा सा निर्जला जलरहिता प्रदिष्टोक्ता। तथा करीरवृक्षा यत्र रक्ताङ्कुरा लोहितै-
रङ्कुरैः संयुक्ताः क्षीरयुताः क्षीरसंयुक्ताः, धरा भूर्यदि च रक्ता लोहितवर्णा भवति, तत्राश्म-
नोऽधः पाषाणस्य तले जलमुदकं भवति।।१०६।।
अन्यदप्याह—
वैदूर्यमुद्गाम्बुदमेचकाभा पाकोन्मुखोदुम्बरसन्निभा वा।
भङ्गाञ्जनाभा कपिलाथवा या ज्ञेया शिला भूरिसमीपतोया ॥१०७॥
वैदूर्य मणि, मूंग या मेघ के समान काला, पकने वाले गूलर के फल के समान,
फोड़ने से अञ्जन के समान काला या पीला पत्थर जहाँ हो, वहाँ पर समीप में ही बहुत
जल होता है।।१०७।।
या शिला वैदूर्यमणेर्मुद्गानामम्बुदस्य मेघस्य मेचकस्य कृष्णवर्णस्य सदृशवर्णा, तथा
या शिला पाकोन्मुखस्य सुपरिपक्वस्योदुम्बरस्य फलस्य सन्निभा सदृशी, या च शिला
भङ्गे स्फोटने अञ्जनाभा अञ्जनसदृशी, अथवा कपिलवर्णा या च शिला, सा भूरिसमीपतोया
भूरि प्रभूतं समीपं निकटं तोयं जलं यस्यां तथाभूता सापि शिला ज्ञेया ज्ञातव्या।।१०७।।
अन्यदप्याह—
पारावतक्षौद्रघृतोपमा या क्षौमस्य वस्त्रस्य च तुल्यवर्णा।
या सोमवल्ल्याश्च समानरूपा साप्याशु तोयं कुरुतेऽक्षयञ्च ॥१०८॥
कबूतर, शहद, घृत या सोमलता के समान रंग वाला पत्थर जहाँ पर हो, वहाँ भी
कभी नहीं नष्ट होने वाला जल शीघ्र निकलता है।।१०८।।
या च शिला पारावतस्य पक्षिणः सदृशी, क्षौद्रं माक्षिकं घृतमाज्यं तदुपमा तत्स-
दृशी, या च सोमवल्ल्याः समानरूपा सदृशवर्णा, सोमयाज्ञिकस्य वल्लीव। सापि शिला
या आशु शीघ्रमेव अक्षयं स्थिरं तोयमुदकं कुरुते।।१०८।।
अन्यदप्याह—
ताम्रैः समेता पृषतैर्विचित्रै-
रापाण्डुभस्मोष्ट्रखरानुरूपा ।
भृङ्गोपमाङ्गुष्ठिकपुष्पिका वा
सूर्याग्निवर्णा च शिला वितोया ॥१०९॥
ताम्र वर्ण के बिन्दुओं से युत, विचित्र बिन्दुओं से युत, पाण्डु वर्ण वाला, भस्म
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