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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 760 में से

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पृष्ठ 130

१०२ बृहत्संहिता
अन्यदप्याह—
या मौञ्जिकैः काशकुशैश्च युक्ता
नीला च मृद्यत्र सशर्करा च।
तस्यां प्रभूतं सुरसं च तोयं
कृष्णाथवा यत्र च रक्तमृद्वा ॥१०३ ॥
मूञ्ज, काश और कुश से युत भूमि में, पत्थर की कणाओं से मिली हुई नीली मिट्टी
वाली भूमि में और काली या लाल मिट्टी वाली भूमि में प्रचुर मात्रा में तथा मधुर जल
होता है॥१०३॥
या भूर्मौञ्जिकैः काशैः कुशैश्च तृणविशेषैर्युक्ता, यत्र यस्यां भूमौ नीला नीलवर्णा मृत्
सशर्करा सकणिका च भवति, तस्यां भूमौ प्रभूतं बहु सुरसं मृष्टं च तोयं जलं भवति।
यत्र कृष्णा कृष्णवर्णा रक्ता रक्तवर्णा वा मृत् तत्र च प्रभूतं बहु सुरसं तोयं भवेदिति॥१०३॥
अथ भूगुणानाह—
सशर्करा ताम्रमही कषायं क्षारं धरित्री कपिला करोति ।
आपाण्डुरायां लवणं प्रदिष्टं मृष्टं पयो नीलवसुन्धरायाम् ॥१०४॥
पत्थर के कणों से मिली हुई ताम्र वर्ण की भूमि में कसैला, पीली भूमि में खारा,
पाण्डु रङ्ग की भूमि में नमकीन और नीली भूमि में मीठा जल होता है॥१०४॥
या मही भूः सशर्करा सकणिका ताम्रवर्णा च सा कषायं पयः पानीयं करोति। कपिला
कपिलवर्णा च धरित्री भूः क्षारं पयः करोति। आपाण्डुरायां धरित्र्यां लवणं पयः प्रदिष्ट-
मुक्तम्। नीलवसुन्धरायां नीलायां भूमौ मृष्टं पयो भवति॥१०४॥
अन्यदप्याह—
शाकाश्वकर्णार्जुनविल्वसर्जाः श्रीपर्ण्यरिटाधवशिशपाश्च ।
छिद्रैश्च पत्रैर्द्रुमगुल्मवल्ल्यो रूक्षाश्च दूरेऽम्बु निवेदयन्ति ॥१०५॥
जहाँ पर छिद्र वाले पत्तों से युत शाक ( तरकारी = सब्जी ), अश्वकर्ण ( संखुआ ),
अर्जुन, बेल, सर्ज, श्रीपर्णी, अरिष्ट, धव, शीशम—ये वृक्ष हों तथा जहाँ पर छिद्र वाले
रूखे पत्तों से युत वृक्ष, गुल्म, लता हों; वहाँ बहुत दूर पर जल होता है॥१०५॥
शाकः, अश्वकर्णः, अर्जुनः, विल्वः, सर्जः, श्रीपर्णीः, अरिष्टा, धवः, शिंशपः—
एते सर्व एव वृक्षविशेषाः। यत्र छिद्रैः पत्रैः छिद्रसंयुक्तैः पर्णेर्भवन्ति, तथा द्रुमगुल्मवल्ल्यः
छिद्रैश्च पत्रै रूक्षाश्च निःस्नेहाः। दूरे अनिकटे अम्बु जलं निवेदयन्ति। तत्रातिदूरे जलं
भवतीत्यर्थः॥१०५॥
अन्यदप्याह—
सूर्याग्निभस्मोट्रखरानुवर्णा या निर्जला सा वसुधा प्रदिष्टा ।
रक्ताङ्कुराः क्षीरयुताः करीरा रक्ता धरा चेज्जलमश्मनोऽधः ॥१०६॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA