बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९६ बृहत्संहिता
जहाँ सफेद काँटों से युत शमी वृक्ष हो, वहाँ उस वृक्ष से दक्षिण हाथ पर पचहत्तर
पुरुषप्रमाण नीचे जल होता है। यहाँ पर खुदाई करने पर आधा पुरुषप्रमाण नीचे सर्प
निकलता है।।८५।।
यत्र यस्मिन् प्रदेशे श्वेता शुक्लवर्णा कण्टकबहुला प्रभूतकण्टका शमी भवति, तत्र
शम्या दक्षिणेन हस्तमात्रात् परतो नरपञ्चकसंयुतया सप्तत्या पञ्चसप्तत्या पुरुषैरधो जलं
पयो भवति। नरार्धे पुरुषार्धे च खाते अहिः सर्पो भवति। तथा च सारस्वतः—
श्वेतातिकण्टका यत्र शमी स्यात्तत्र दक्षिणे।
हस्तेन पञ्चसप्तत्या नराणां निर्दिशेज्जलम्।।
खातेऽर्धपुरुषे सर्पो दृश्यतेऽञ्जनप्रभः।
सुरसं च जलं ज्ञेयं चिरकालप्रवाहितम्।। इति।।८५।।
अत्रैव विशेषान्तरमाह—
मरुदेशे यच्चिह्नं न जाङ्गले तैर्र्जलं विनिर्देश्यम् ।
जम्बूवेतसपूर्वैर्ये पुरुषास्ते मरौ द्विगुणाः ।।८६।।
जिन चिह्नों से मरुस्थल में जल-ज्ञान कहा गया है, उन चिह्नों से जाङ्गल ( स्वल्प
जल वाले ) देश में जल-ज्ञान नहीं कहना चाहिये। पहले जामुन, बेंत आदि के द्वारा
जल-ज्ञान के समय जो पुरुष-प्रमाण कहा गया है, उसको द्विगुणित करके मरु देश में
ग्रहण करना चाहिये।।८६।।
यच्चिह्नं यल्लक्षणं मरुदेशे कथितं तैश्चिह्नैर्जाङ्गले स्वल्पोदके देशे जलमुदकं न
विनिर्देश्यं न वक्तव्यम्। जम्बूवेतसपूर्वैरिति । यदि 'वेतसोऽम्बुरहिते देशे' तथा 'जम्ब्वाश्चो-
दग्धस्तैः' इत्यादिकैर्जम्बूवेतसपूर्वैलक्षणैर्यै पुरुषाः कथितास्तैरेव चिह्नैर्मरौ मरुभूमौ दृष्टैर्द्विगुणास्त
एव पुरुषा वाच्या इति।।८६।।
अन्यदप्याह—
जम्बूस्त्रिवृता मौर्वी शिशुमारी सारिवा शिवा श्यामा ।
वीरुधयो वाराही ज्योतिष्मती गरुडवेगा च ॥८७॥
सूकरिकमाषपर्णीव्याघ्रपदाश्चेति यद्यहेर्निलये ।
वल्मीकादुत्तरतस्त्रिभिः करैस्त्रिपुरुषे तोयम् ॥८८॥
यदि वल्मीक के ऊपर जामुन, निसोत, मौर्वी, शिशुमारी, सारिवा, शिवा ( शमी ),
• श्यामा, वाराही, ज्योतिष्मती ( मालकाकणी ), गरुडवेगा, सूकरिका, माषपर्णी ( मूड़ ),
व्याघ्रपदा—ये औषधियाँ हों तो वल्मीक से उत्तर की ओर तीन हाथ पर तीन पुरुषप्रमाण
नीचे जल होता है।।८७-८८।।
जम्बूवृक्षविशेषः त्रिवृता, मौर्वी, शिशुमारी, सारिवा, शिवा, श्यामा—एता वीरुधय
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