बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४ बृहत्संहिता
यदि वल्मीक से युक्त ताड़ (ताल) या नारियल का वृक्ष हो तो उस वृक्ष से छः
हाथ पश्चिम दिशा में चार पुरुष नीचे दक्षिणवाहिनी शिरा होती है।।४०।।
यदि वल्मीकसंवृतो वल्मीकयुक्तस्तालवृक्षो भवति, नालिकेरो वा वल्मीकसंवृतो
भवति, तदा तस्य तालस्य नालिकेरस्य वा पश्चात् पश्चिमायां दिशि षड्भिर्हस्तैः परतश्च-
तुर्भिर्नरैरधः शिरा याम्या दक्षिणा वहति।।४०।।
अन्यदप्याह—
याम्येन कपित्थस्याहिसंश्रयश्चेदुदग्जलं वाच्यम्।
सप्त परित्यज्य करान् खात्वा पुरुषान् जलं पञ्च ।।४१।।
कर्बुरकोऽहिः पुरुषे कृष्णा मृत् पुटभिदपि च पाषाणः ।
श्वेता मृत् पश्चिमतः शिरा ततश्चोत्तरा भवति ।।४२।।
कपित्थ (कैथ) के वृक्ष से दक्षिण में वल्मीक हो तो उस वृक्ष से सात हाथ उत्तर
दिशा में पाँच पुरुष नीचे जल होता है। यहाँ पर एक पुरुषतुल्य नीचे चितकबरा सर्प
और काली मिट्टी होती है। उसके नीचे परतदार पत्थर, उसके नीचे सफेद मिट्टी तथा
एक पश्चिमवाहिनी शिरा और उसके नीचे उत्तरवाहिनी शिरा होती है।।४१-४२।।
याम्येनेति । कपित्थवृक्षस्य याम्येन दक्षिणस्यां दिशि यद्यहिसंश्रयो वल्मीको भवेत्,
तत उदगुत्तरस्यां दिशि कपित्थस्य सप्त करान् हस्तान् परित्यज्य पञ्च पुरुषान् खात्वाऽधो
जलं वाच्यम्।
कर्बुरकोऽहिरिति । पुरुषे खाते कर्बुरकः कृष्णशुक्लः कपिलवर्णोऽहिः सर्पो भवति।
तथा कृष्णा कृष्णवर्णा मृत्। ततः पुटभित् पुटभेदकः पाषाणोऽश्मा। पुटैर्दलैर्भिद्यत इति
पुटभित्। ततः श्वेता मृत्। तत्र च पश्चिमायां दिशि शिरा एका भवति। ततोऽनन्तरमुत्तरा
शिरा च भवति।।४१-४२।।
अन्यदप्याह—
अश्मन्तकस्य वामे बदरी वा दृश्यतेऽहिनिलयो वा।
षड्भिरुदक् तस्य करैः सार्धे पुरुषत्रये तोयम् ।।४३।।
कूर्मः प्रथमे पुरुषे पाषाणो धूसरः ससिकता मृत् ।
आदौ च शिरा याम्या पूर्वोत्तरतो द्वितीया च ।।४४।।
अश्मन्तक वृक्ष के बाँयीं तरफ बेर का वृक्ष या वल्मीक हो तो उस वृक्ष से छः
हाथ आगे उत्तर दिशा में साढ़े तीन पुरुष नीचे जल होता है। यहाँ पर एक पुरुष नीचे
कछुआ, उसके नीचे धूसर वर्ण का पत्थर, उसके नीचे रेतीली मिट्टी, उसके नीचे दक्षिण
शिरा और उसके नीचे ईशान कोण की शिरा निकलती है।।४३-४४।।
अश्मन्तकस्य वृक्षस्य वामे उत्तरस्यां दिशि बदरीवृक्षो दृश्यते, अहिनिलयो वल्मीको
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