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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 760 में से

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पृष्ठ 110

८२ बृहत्संहिता
तरूणां यत्र सर्वेषामधःस्थो दर्दुरो भवेत्।
वृक्षादुदग्दिशि जलं हस्तात् सार्धैर्नरैरधः।।
चतुर्भिः पुरुषे खाते नकुलो नीलमृत्तिका।
पीतश्वेता ततो भेकसदृशोऽश्मा प्रदृश्यते।। इति।।३१-३२।।
अन्यदप्याह—
यद्यहिनिलयो दृश्यो दक्षिणतः संस्थितः करञ्जस्य ।
हस्तद्वये तु याम्ये पुरुषत्रितये शिरा सार्धे ।। ३३ ।।
कच्छपकः पुरुषार्द्धे प्रथमं चोद्भिद्यते शिरा पूर्वा ।
उदगन्या स्वादुजला हरितोऽश्माधस्ततस्तोयम् ।। ३४ ।।
यदि करञ्जक वृक्ष के दक्षिण दिशा में वल्मीक दिखाई दे तो उस वृक्ष से दो हाथ
दक्षिण तीन पुरुष नीचे शिरा होती है। यहाँ पर आधा पुरुष नीचे कछुआ, उसके नीचे
पूर्ववाहिनी शिरा, उसके नीचे उत्तरवाहिनी शिरा, उसके नीचे हरे रंग का पत्थर और
उसके नीचे जल निकलता है।।३३-३४।।
यदि करञ्जवृक्षस्य दक्षिणतो दक्षिणस्यां दिशि संस्थितोऽहिनिलयः सर्पगृहं वल्मीको
दृश्यते, तदा याम्ये दक्षिणे करञ्जाद्धस्तद्वये हस्तद्वयं त्यक्त्वा अधः सार्धे पुरुषत्रितये शिरा
भवति।
अत्र चिह्नानि—पुरुषार्धे खाते कच्छपकः कूर्मो दृश्यते। तत्र प्रथममादौ पूर्वा शिरा
उद्भिद्यते दृश्यते। ततोऽन्या द्वितीया उदगुत्तरस्यां दिशि शिरा स्वादुजला मृष्टोदका उद्भिद्यते।
अधो हरितः शुकवर्णोऽश्मा भवति। ततः परं तोयं जलं भवति।।३३-३४।।
अन्यदप्याह—
उत्तरतश्च मधूकादहिनिलयः पश्चिमे तरोस्तोयम् ।
परिहृत्य पञ्च हस्तानर्धाष्टमपौरुषान् प्रथमम् ।। ३५ ।।
अहिराजः पुरुषेऽस्मिन् धूम्रा धात्री कुलुत्थवर्णोऽश्मा ।
माहेन्द्री भवति शिरा वहति सफेनं सदा तोयम् ।। ३६ ।।
महुए के वृक्ष से उत्तर वल्मीक हो तो उस वृक्ष से पाँच हाथ आगे पश्चिम दिशा में
साढ़े आठ पुरुष नीचे जल होता है। यहाँ पर एक पुरुष नीचे प्रधान सर्प, उसके नीचे
धूम्र वर्ण की पृथ्वी, उसके नीचे कुलथी के रंग का पत्थर और उसके नीचे सदा फेनयुक्त
जल देने वाली पूर्ववाहिनी शिरा निकलती है।।३५-३६।।
मधूकाद् मधूकवृक्षादुत्तरत उत्तरस्यां दिशि यद्यहिनिलयो वल्मीको दृश्यते, तदा तरोर्मधू-
कात् पश्चिमे पश्चिमायां दिशि पञ्च हस्तान् परिहृत्य त्यक्त्वा ततोऽधोऽर्धाष्टमपौरुषान् खात्वा
सार्धैः सप्तभिर्नरैरधस्तोयं जलं भवति।
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