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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 760 में से

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पृष्ठ 105

दकार्गलाध्यायः ७७
अन्यदप्याह—
पूर्वेण यदि बदर्या वल्मीको दृश्यते जलं पश्चात्।
पुरुषैस्त्रिभिरादेश्यं श्वेता गृहगोधिकाऽर्द्धनरे ॥१६॥
यदि बेर के वृक्ष से पूर्व दिशा में वल्मीक हो तो उससे तीन हाथ पश्चिम दिशा में
तीन पुरुष नीचे जल कहना चाहिये। यहाँ पर आधा पुरुष नीचे सफेद छिपकिली निकलती
है॥१६॥
यदि बदर्या बदरीवृक्षस्य पूर्वेण पूर्वभागे वल्मीको वल्मीककृतो मृत्स्तूपो दृश्यते,
तदा बदर्याः पश्चात् पश्चिमायां दिशि त्रिभिः करैः प्रागुक्तैः परतस्त्रिभिः पुरुषैरधो जलमुदकमादेश्यं
वक्तव्यम्। अर्धनरे खाते श्वेता गृहगोधिका दृश्यते। गृहगोधिका कुड्यमत्स्या। तथा च
सारस्वतः—
पूर्वभागं बदर्याश्चेद्वल्मीको दृश्यते जलम्।
पश्चाद्धस्तत्रये वाच्यं खाते तु पुरुषत्रये।।
अधःखातेऽर्धपुरुषे दृश्यते गृहगोधिका।
श्वेतवर्णा ततोऽधःस्थं जलं भवति निर्मलम्।। इति।।१६।।
अन्यदप्याह—
सपलाशा बदरी चेद् दिश्यपरस्यां ततो जलं भवति।
पुरुषत्रये सपादे पुरुषेऽत्र च डुण्डुभश्चिह्नम् ॥१७॥
जलरहित देश में पलाश (ढाक) के वृक्ष से युक्त बेर का वृक्ष हो तो उससे तीन
हाथ पश्चिम दिशा में सवा तीन पुरुष नीचे जल होता है। यहाँ पर एक पुरुष नीचे विषरहित
सर्प मिलता है॥१७॥
चेच्छब्दो यद्यर्थे। यदि जलरहिते देशे सपलाशा पलाशवृक्षसहिता बदरी दृश्यते
सवल्मीका वल्मीकविमुखा वा, तदाऽपरस्यां पश्चिमायां दिशि ततस्तस्या बदर्यास्त्रिभिरेव
करैः परतोऽधः सपादे पुरुषत्रये जलं तोयं भवति। अत्र च चिह्नम्—पुरुषे खाते डुण्डुभो
निर्विषः सर्पो दृश्यते। तथा च सारस्वतः—
पलाशयुक्ता बदरी यत्र दृश्या ततोऽपरे।
हस्तत्रयादधस्तोयं सपादे पुरुषत्रये।।
नरे तु डुण्डुभः सर्पो निर्विषश्चिह्नमेव च।
अधस्तोयं च सुस्वादु दीर्घकालं प्रवाहितम्।। इति।।१७।।
अन्यदप्याह—
बिल्वोदुम्बरयोगे विहाय हस्तत्रयं तु याम्येन।
पुरुषस्त्रिभिरम्बु भवेत् कृष्णोऽर्द्धनरे च मण्डूकः ॥१८॥
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