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सर्वकोश
बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: द्वितीय भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 2 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 760 में से

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पृष्ठ 104

७६ बृहत्संहिता
श्वेता गोधार्धनरे पुरुषे मृद्धूसरा ततः कृष्णा ।
पीता सिता ससिकता ततो जलं निर्दिशेदमितम् ॥ १३॥
अर्जुन वृक्ष से तीन हाथ उत्तर दिशा में बाँबी हो तो उससे तीन हाथ पश्चिम दिशा
में साढ़े तीन पुरुष नीचे जल होता है। यहाँ पर भी खोदने पर कुछ चिह्न मिलते हैं;
जैसे—आधा पुरुष नीचे गोधा ( गोह ), एक पुरुषतुल्य नीचे काली-सफेद मिट्टी, उसके
नीचे काली मिट्टी, उसके नीचे पीली मिट्टी, उसके नीचे सफेद रेत और उसके नीचे
अधिक जल निकलता है॥ १२-१३॥
अर्जुनवृक्षस्योदगुत्तरस्यां दिशि यदि वल्मीको दृश्यते, वल्मीककृतो मृत्स्तूपो यदि
भवति, ततोऽस्मादर्जुनात् पश्चात् पश्चिमायां दिशि त्रिभिर्हस्तैरतीतैरधस्त्रिभिरर्धसमन्वितैः
सार्धैस्त्रिभिः पुरुषैरम्बु जलं भवति।
श्वेतेति । अत्र चिह्नानि भवन्ति। अर्धनरे खाते श्वेता शुक्लवर्णा गोधा प्राणिविशेषो
दृश्यते। पुरुषे खाते धूसरा कृष्णश्वेता मृन्मृत्तिका। ततोऽनन्तरं कृष्णा मृत्। ततः पीत-
वर्णाः। ततोऽपि सिता श्वेता ससिकता वालुकासहिता। ततोऽनन्तरममितं प्रभूतं जलमुदकं
निर्दिशेद् वदेत्॥ १२-१३॥
अन्यदप्याह—
वल्मीकोपचितायां निर्गुण्ड्यां दक्षिणेन कथितकरैः ।
पुरुषद्वये सपादे स्वादु जलं भवति चाशोष्यम् ॥१४॥
रोहितमत्स्योऽर्धनरे मृत् कपिला पाण्डुरा ततः परतः ।
सिकता सशर्कराऽथ क्रमेण परतो भवत्यम्भः ॥ १५॥
वल्मीकयुक्त निर्गुण्डी ( सिन्दुवार वृक्ष ‘सिन्दुवारेन्द्रसुरसौ निर्गुण्डीन्द्राणिकेत्यपी’-
त्यमरः ) हो तो उससे तीन हाथ दक्षिण दिशा में सवा दो पुरुष नीचे कभी नहीं सूखने
वाला जल होता है। यहाँ पर खोदने के समय वक्ष्यमाण चिह्न मिलते हैं—
आधा पुरुष नीचे लाल मछली, उसके नीचे पीली मिट्टी, उसके नीचे सफेद मिट्टी,
उसके नीचे पत्थर के सूक्ष्म कणों से समन्वित रेत और उसके नीचे जल की प्राप्ति होती
है॥ १४-१५॥
निर्गुण्डी द्रव्यविशेषः। वनमिति प्रसिद्धम्। वल्मीकोपचिता वल्मीककृता मृत्स्तूपसंयुक्ता
तत्र निर्गुण्ड्यां दक्षिणस्यां दिशि कथितकरैरुक्तहस्तैस्त्रिभिरित्यर्थः। पुरुषद्वये सपादे पादा-
धिके खाते अधः स्वादु मृष्टं जलमुदकमशोष्यं भवति।
रोहितवर्णो मत्स्योऽर्धनरे अर्धपुरुषे खाते। ततो मृत्तिका कपिला गौरवर्णा। ततः
परतः पाण्डुरा शुक्लवर्णा किञ्चित्। ततः सिकता वालुका सशर्कराऽथ सकर्णिका। क्रमेण
परिपाट्या। ततः परतोऽम्भो जलं भवति॥ १४-१५॥
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