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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 655, कुल 728 में से

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पृष्ठ 655

अङ्गविद्याध्यायः ६१३
ब्रूयात्। ललाटमध्यं स्पृशन्ती चत्वार्यपत्यानि। ललाटान्तं त्रीणि। कर्णयोः संस्पर्शे
पञ्चापत्यानि। दक्षिणोरुसंस्पर्शे द्वौ पुत्रौ द्वे च कन्यके जनयिष्यसीति। वामस्य तिस्रः
कन्या द्वौ पुत्रौ। पादाङ्गुष्ठस्य कन्यकैका। पाष्ण्योः कन्यकैकैवेति' इति।।४१।।
अथ गर्भिण्याः कस्मिन्नक्षत्रे जन्तुर्जन्म भविष्यतीति ज्ञानार्थमाह—
शिरोललाटभ्रूकर्णगण्डं हनुरदा गलम्।
सव्यापसव्यस्कन्धश्च हस्तौ चिबुकनालकम् ।।४२।।
उरः कुचं दक्षिणमप्यसव्यं हृत्पार्श्वमेवं जठरं कटिश्च।
स्फिक्पायुसन्ध्यूरुयुगञ्च जानू जङ्गेऽथ पादाविति कृत्तिकादौ ।।४३।।
'सन्तान किस नक्षत्र में उत्पन्न होगी' इस तरह के प्रश्नकाल में यदि स्त्री शिर,
ललाट, भौं, कान, गाल, कनपटी, दाँत, गर्दन, दक्षिण स्कन्ध, वाम स्कन्ध, दोनों हाथ,
ठोढ़ी, कण्ठ, छाती, दक्षिण स्तन, वाम स्तन, हृदय, दक्षिण बगल, वाम बगल, पेट,
कमर, स्फिक् ( कुल्ला ) और गुदा की सन्धि, दक्षिण ऊरु, वाम ऊरु, जानु, जंघा और
पाँव का स्पर्श करे तो क्रम से कृत्तिका आदि नक्षत्र में जन्म कहना चाहिये। जैसे शिर
का स्पर्श करे तो कृत्तिका, ललाट का स्पर्श करे तो रोहिणी, भौं का स्पर्श करे तो
मृगशिरा इत्यादि में जन्म कहना चाहिये।।४२-४३।।
सूत इत्यनुवर्तते। पृच्छासमये गर्भिण्याः शिरःप्रभृतिसंस्पर्शे कृत्तिकादौ नक्षत्रे जन्म
विन्द्यात्। तत्र शिरो मूर्धा तत्संस्पर्शे कृत्तिकानक्षत्रे जन्म भवति गर्भिणी सूते। एवं ललाटे
रोहिण्याम्। भ्रुवौ मृगशिरसि। कर्णयोराद्रायाम्। गण्डयोः पुनर्वसौ। हन्वोस्तिष्ये। रदा दन्ता-
स्तेष्वाश्लेषायाम्। गले ग्रीवायां मघासु। सव्ये दक्षिणस्कन्धस्पर्शे पूर्वफल्गुन्याम्।
अपसव्ये वामस्कन्धसंस्पर्शे उत्तरफल्गुन्याम्। हस्तयोः संस्पर्शे हस्ते। चिबुके आस्याधः
चित्रायाम्। नालके कण्ठे स्वातौ। उरसि वक्षसि विशाखायाम्। कुचौ स्तनौ
तत्र दक्षिणस्तनसंस्पर्शने अनुराधायाम्, अपसव्ये वामे ज्येष्ठासु। हृदि मूले। पार्श्वद्वयमेवं
प्राग्वत्। तेन दक्षिणे पार्श्वे पूर्वाषाढायाम्। वाम उत्तराषाढायाम्। जठरे श्रवणे। कट्यां
धनिष्ठायाम्। स्फिग्गुदयोः सन्धिस्पर्शने शतभिषजि। दक्षिणोरुस्पर्शने पूर्वभद्रपदायाम्।
वामोरुस्पर्शने उत्तरभद्रपदायाम्। जान्वो रेवत्याम्। जङ्घयोरश्विन्याम्। पादयोर्भरण्यामिति।
तथा च पराशरः—
'शिरसि संस्पृष्टे कृत्तिकासु जन्म विन्द्यात्। ललाटे रोहिण्याम्। भ्रुवोर्मृगशिरसि।
कर्णयोराद्रायाम्। गण्डयोः पुनर्वसौ। हन्वोस्तिष्ये। दन्तयोराश्लेषासु। ग्रीवायां मघासु।
दक्षिणांसे प्राक्फल्गुन्याम्। वामांसे उत्तरफल्गुन्याम्। हस्ते हस्तयोः। चिबुके चित्रायाम्।
स्वातौ नालके। उरसि विशाखायाम्। दक्षिणस्तेऽनुराधासु। ज्येष्ठासु वामे। हृदि मूले।
दक्षिणपार्श्वे प्रागषाढासु। उत्तराषाढासु परपार्श्वे। जठरे श्रवणे। श्रोण्यां धनिष्ठासु। स्फिग्गु-
दयोर्वारुणे। दक्षिणोरुणा प्रा ष्ठपदायाम्। वामेनोत्तरपदायाम्। जानुभ्यां पौष्णे। जङ्घयोर-
श्विन्याम्। पादयोर्भरण्यामिति' ।।४२-४३।।
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